जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमान से रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्य के द्वारा बिना राग-द्वेष के किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
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