Krishjan
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अध्याय 5 — सुन्दरकाण्ड
बरवै रामायण
6 श्लोक • केवल अनुवाद
श्रीजानकीजी कहती हैं
— हृदय में जब वियोग की अग्नि भड़क उठती है, तब मेरी शत्रु ये दोनों आँखें
(आँसू बहाकर)
उसे बुझा देती हैं;
(उस अग्रि में मुझे जल नहीं जाने देतीं)
।
यह फैली हुई रात्रि की चाँदनी नहीं है
(दुःखदायिनी)
धूप है। मुझे श्रीराम के बिना
(समस्त)
जगत जलता-सा लगता है।
हनुमान्! अब जीवित रहने की कोई आशा नहीं है।
(तुम देखते ही हो कि)
कनिष्ठिका अँगुली की अँगूठी अब कंगन बन गयी
(उसे हाथ में कंगन के समान पहिन सकती हूँ, इतना दुर्बल शरीर हो गया है)
।
श्रीराम के सुयश का प्रचार चारों युगों में होता है, किंतु असुरों कों देखकर लगता है कि संसार में अँधेरा
(अन्याय ही व्याप्त)
है
(अर्थात् इस समय श्रीराम का यश राक्षसों के अत्याचार में छिप गया है)
।
(हनुमानूजी श्रीरामजी से कहते हैं—)
‘श्रीजानकीजी के दु:ख का वर्णन किस प्रकार करूँ। कामदेव आकर उन्हें
(अपने)
पुष्पबाण से बींधता रहता है'।
जब शरदू-ऋतु के चन्द्रमा की चाँदनी प्रकट होकर चारों दिशाओं में
(सब ओर)
फैल जाती है, तब
(वह श्रीजानकीजी को सूर्य की धूप के समान ऐसी उष्ण लगती है कि)
चन्द्रमा को अपने कुल
(सूर्यवंश)
का प्रवर्तक
(सूर्य)
समझकर हाथ जोड़कर
(उससे)
प्रार्थना करती है।
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