बिरह आगि उर ऊपर जब अधिकाइ।
ए अँखियाँ दोउ बैरति देहिं बुझाइ॥
(श्रीजानकीजी कहती हैं) - हृदय में जब वियोग की अग्नि भड़क उठती है, तब मेरी शत्रु ये दोनों आँखें (आँसू बहाकर) उसे बुझा देती हैं; (उस अग्रि में मुझे जल नहीं जाने देतीं)।
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