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बरवै रामायण • अध्याय 5 • श्लोक 3
अब जीवन कै है कपि आस न कोइ। कनगुरिया कै मुदरी कंकन होइ॥
हनुमान्‌! अब जीवित रहने की कोई आशा नहीं है। (तुम देखते ही हो कि) कनिष्ठिका अँगुली की अँगूठी अब कंगन बन गयी (उसे हाथ में कंगन के समान पहिन सकती हूँ, इतना दुर्बल शरीर हो गया है)।
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