जब शरदू-ऋतु के चन्द्रमा की चाँदनी प्रकट होकर चारों दिशाओं में (सब ओर) फैल जाती है, तब (वह श्रीजानकीजी को सूर्य की धूप के समान ऐसी उष्ण लगती है कि) चन्द्रमा को अपने कुल-(सूर्यवंश) का प्रवर्तक (सूर्य) समझकर हाथ जोड़कर (उससे) प्रार्थना करती है।
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