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बरवै रामायण • अध्याय 5 • श्लोक 2
डहकनि हैं अजिअरिया निसि नहिं धाम। जगत जरत अस लागु मोहि बिनु राम॥
यह फैली हुई रात्रि की चाँदनी नहीं है (दुःखदायिनी) धूप है। मुझे श्रीराम के बिना (समस्त) जगत‌ जलता-सा लगता है।
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