मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 2 — अयोध्याकाण्ड

बरवै रामायण
8 श्लोक • केवल अनुवाद
(मन्थरा महारानी कैकेयीजी से कहती है कि श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये) सब प्रकार की तैयारियाँ करते, साज सजाते (महाराज को) सात दिन हो गये हैं! (आप अब) क्या पूछती हैं, आपका स्वभाव बहुत ही सीधा है।
श्रीराम राजभवन में श्रीजानकी के साथ (नाना प्रकार से) सुख भोग रहे थे; किंतु वहीं राज्य छोड़कर वन के लिये चल पड़े। विधाता की बड़ी ही विपरीत चाल है।
(मार्ग में श्रीराम-लक्ष्मण को देखने पर) कोई कहता है कि ‘ये नर और नारायण ऋषि हैं’, कोई कहता है कि ‘ये विष्णु और शिव हैं’।
तुलसीदासजी कहते हैं कि (मार्गवासियों की) बुद्धि अनुमान करते-करते थक गयी। श्रीराम-लक्ष्मण के समान दूसरा कोई (देवतादि का) रूप नहीं दिखायी पड़ा।
तुलसीदासजी (केवट के शब्दों को दुहराते प्रभु से) कहते हैं – गङ्गा में (खड़े होकर मैं) सच कह रहा हूँ कि (आप मेरी नौका पर) चरण मत रखें, (नहीं तो नौका स्त्री के रूप में बदल जायगी और मेरी स्त्री मुझे एक और स्त्री के साथ देखकर) नित्य ही सर्वथा नंगा करके नाच नचाया करेगी।
निषाद हाथ में जल भरा कठौता लेकर (प्रभु से) कहता है – ‘चरण धोकर नौका पर चढ़िये, तर्क-वितर्क मत कौजिये’।
(ग्राम-नारियाँ श्रीरम-लक्ष्मण तथा जानकीजी को मार्ग में जाते देखकर कहती हैं) सखी! कमल तो काँटों से युक्त होता है; इनके चरण तो (उससे भी) कोमल हैं। (इतना ही नहीं,) वह रात्रि में म्लान (बंद) हो जाता है, ये नित्य प्रफुल्लित दीखते हैं।
महर्षि वाल्मीकीजी ने कहा – ‘सुन्दर वेषधारी श्रीरघुनाथजी द्विभुज विष्णु हैं और लक्ष्मणजी एक जिह्वा वाले दूसरे शेषनाग हैं’।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें