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बरवै रामायण • अध्याय 2 • श्लोक 5
तुलसी जनि पग धरहु गंग गह साँच। निगानाँग करि नितहि नचाइहि नाच॥
तुलसीदासजी (केवट के शब्दों को दुहराते प्रभु से) कहते हैं – गङ्गा में (खड़े होकर मैं) सच कह रहा हूँ कि (आप मेरी नौका पर) चरण मत रखें, (नहीं तो नौका स्त्री के रूप में बदल जायगी और मेरी स्त्री मुझे एक और स्त्री के साथ देखकर) नित्य ही सर्वथा नंगा करके नाच नचाया करेगी।
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