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बरवै रामायण • अध्याय 2 • श्लोक 7
कमल कंटकित सजनी कोमल पाइ। निसि मलिन यह प्रफुलित नित दरसाइ॥
(ग्राम-नारियाँ श्रीरम-लक्ष्मण तथा जानकीजी को मार्ग में जाते देखकर कहती हैं) सखी! कमल तो काँटों से युक्त होता है; इनके चरण तो (उससे भी) कोमल हैं। (इतना ही नहीं,) वह रात्रि में म्लान (बंद) हो जाता है, ये नित्य प्रफुल्लित दीखते हैं।
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