अध्याय 9 — नवमः खण्डः
सुबाल
16 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके पश्चात् रैक ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया हे भगवन्! ये समस्त पदार्थ किसमें अस्त होते हैं? (पह सुनकर) घोराङ्गिरस ने रैक को उत्तर दिया जो पदार्थ चक्षु के प्रति प्राप्त (प्रकट) होते हैं (दिखाई देते हैं), वे अक्षु (अपने अन्तर्यामी) में हो अस्त हो जाते हैं। जो द्रव्य पदार्थ आदित्य के प्रति प्रकट होता है, यह आदित्य में ही विलीन हो जाता है। जो आदित्य विराजा (सुमुक्षा नामक नाड़ी का ही एक नाम) के प्रति प्रकट होता है, यह विराजा में ही विलीन हो जाता है। जो विराजा प्राण के प्रति प्रकट होती है, वह प्राण में ही विलीन हो जाती है। जो प्राण, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। जो विज्ञान, आनन्द के प्रति प्रकट होता है, वह आनन्द में ही अस्त होता है। जो आनन्द, तुरीय के प्रति प्रकट होता है, यह तुरीय में ही अस्त होता है। वह तुरीय अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म को प्राप्त होता है।
(जिस-जिस संज्ञा वाली नाड़ियाँ मनुष्य में होती हैं, वे सभी मूलतः विराट् पुरुष में भी होती हैं, जिस तरह विराट् पुरुष-परमात्मा का अंश आत्मा है, वैसे ही नाड़ियाँ भी विराट् के नाड़ी तंत्र की अंग हैं। आदित्य आदि देवों का प्राकट्य और विलय उन्हीं के प्रति कहा गया है। आगे के मंत्रों में भी अधिदेवता का विलय जिन नाड़ियों में कहा गया है, वे सभी विराट् की नाड़ियाँ ही मान्य हैं।)
इसी प्रकार जो श्रोत्र के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोत्र में ही अस्त होता है। जो श्रोत्र, श्रोतव्य के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोतव्य में ही अस्त होता है। जो श्रोतव्य, दिशाओं के प्रति प्रकट होता है, वह दिशाओं में ही अस्त होता है। जो दिशाएँ, सुदर्शना के प्रति प्रकट होती हैं, वे सुदर्शना में ही अस्त होती हैं। जो सुदर्शना, अपान के प्रति प्रकट होती है, वह अपान में ही अस्त होती है। जो अपान विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। वह विज्ञान अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में विलीन हो जाता है।
इसी प्रकार जो पदार्थ नासिका के प्रति (गन्धरूप में) प्रकट होते हैं, वे नासिका में ही अस्त होते हैं। जो नासिका, घ्रातव्य (सूँघे जाने योग्य) पदार्थों के प्रति प्रकट होती है, वह घ्रातव्य में ही अस्त हो जाती है। जो घ्रातव्य, पृथिवी के प्रति प्रकट होता है, वह पृथिवी में ही विलीन हो जाता है। जो पृथिवी, जिता नामक नाड़ी के प्रति प्रकट होती है, वह जिता में ही अस्त होती है। जो जिता, व्यान के प्रति प्रकट होती है, वह व्यान में ही विलीन हो जाती है। जो व्यान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही विलुप्त हो जाता है। वह विज्ञान, अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में लय हो जाता है।
इसी प्रकार जो पदार्थ जिह्वा के प्रति प्रकट होते हैं, वे जिह्वा में ही विलीन हो जाते हैं। जो जिह्वा, रसमितव्य के प्रति प्रकट होती है, यह रसमितव्य में ही विलीन हो जाती है। जो रसमितव्य, वरुण को प्राप्त होता है, वह वरुण में ही विलीन हो जाता है। जो वरुण, सौम्या नामक नाड़ी को प्राप्त होता है, वह सौम्या में ही विलीन हो जाता है। जो सौम्या, उदान के प्रति प्रकट होती है, वह उदान में ही अस्त हो जाती है। जो उदान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही लय हो जाता है। यह विज्ञान अमृत, भयरहित, सोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म को प्राप्त होता है।
जो पदार्थ त्वचा को प्राप्त होते हैं, वे त्वचा में ही विलीन हो जाते हैं। जो त्वचा, स्पर्शयितव्य के प्रति प्रकट होती है, वह स्पर्शयितव्य में ही अस्त हो जाती है। जो स्पर्शयितव्य, वायु को प्राप्त होता है, वह वायु में ही विलीन हो जाता है। जो वायु मोघा के प्रति प्रकट होती है, वह मोघा नामक नाड़ी में ही विलीन हो जाती है। जो मोषा, समान के प्रति प्राप्त होती है, वह समान में ही अस्त हो जाती है। जो समान, विज्ञान को प्राप्त होती है, वह विज्ञान में ही अस्त हो जाती है। वह अमर, अभय, अशोक, अन्तरहित और बीजरहित ब्राह्म में विलीन हो जाता है।
जो पदार्थ वाक् को प्राप्त होते हैं, वे वाक् में ही अस्त होते हैं। जो वाक्, वक्तव्य को प्राप्त होती है, वह वक्तव्य में ही अस्त होती है। जो वक्तव्य, अग्नि को प्राप्त होता है, वह अग्नि में ही विलीन हो जाता है। जो अग्नि, कुमारा नामक नाड़ी को प्राप्त होती है, वह कुमारा में ही विलीन हो जाती है। जो कुमारा, वैरम्भ को प्राप्त होती है, वह वैरम्भ में ही अस्त हो जाती है। जो वैरम्भ, विज्ञान को प्राप्त होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। वह विज्ञान अमर, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म में विलीन हो जाता है।
(ऐसा कहने के पश्चात् उन घोराङ्गिरस ने पुनः कहना प्रारम्भ किया कि) जो हाथ को प्राप्त कर लेता है, वह हाथ में ही विलीन हो जाता है। यह हाथ, लेने योग्य पदार्थ के प्रति गमन करता है, अतः यह लेने वाले पदार्थ में ही लीन होता है, यह पदार्थ, इन्द्र के प्रति प्रस्थान करता है, इस कारण से यह इन्द्र में ही विलीन हो जाता है, यह इन्द्र, अमृता नाड़ी के प्रति जाता है, इस कारण यह अमृता में ही अस्त हो जाता है, यह अमृता, मुख्य के पास जाती है, अतः मुख्य में ही अस्त हो जाती है, यह मुख्य, विज्ञान के पास जाता है, इस कारण से विज्ञान में ही अपने को विलीन कर लेता है और यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण यह अमर, निर्भय, अशोक एवं अन्तरहित तथा बीजविहीन तुरीयावस्था को ही प्राप्त कर लेता है।
(इसी प्रकार) जो पैर के प्रति गमन करता है, वह पैर में ही विलीन होता है, यह पैर, गन्तव्य स्थान की ओर प्रस्थान करता है, इस कारण से यह गन्तव्य स्थान में विलीन हो जाता है, यह गन्तब्य स्थान विष्णु के प्रति जाता है, इस कारण से यह विष्णु में ही विलीन हो जाता है, यह विष्णु, सत्या नाड़ी की ओर प्रस्थान करता है, इसलिए यह सत्या नाड़ी में ही अपने को विलीन कर लेता है, यह सत्या, अन्तर्याम की ओर गमन करती है, इसलिए यह अन्तर्याम में ही लय हो जाती है, यह अन्तर्याम, विज्ञान की और गमन करता है, इसलिए यह विज्ञान में ही विलय हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के समक्ष जाता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है।
(ऐसा कहने के अनन्तर फिर उन्होंने कहा - जो गुदा को प्राप्त करता है, वह गुदा में ही विलय को पाता है, यह गुदा, विसर्जन योग्य मल त्याग को प्राप्त करता है, अतः यह त्यागने योग्य में ही विलय को प्राप्त करता है, यह मलत्याग, मृत्यु को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्यु में ही विलीन हो जाता है, यह मृत्यु, मध्यमा नाड़ी को प्राप्त करती है, इसलिए यह मध्यमा में ही विलीन होती है, यह मध्यमा, प्रभञ्जन नामक वायु को प्राप्त करती है, अतः यह प्रभञ्जन वायु में ही विलय को प्राप्त होती है, यह प्रभञ्जन वायु विज्ञान को प्राप्त होती है, इस कारण प्रभञ्जन वायु का अस्त विज्ञान में ही होता है। यह विज्ञान, तुरीय के पास जाता है, इसलिए वह मृत्युरहित, भयविहीन, अशोक, अनन्त एवं निर्बोज तुरीयावस्था को प्राप्त हो जाता है।
(यह कहने के पश्चात् पुनः उन्होंने कहना प्रारंभ किया कि) जो उपस्थ को प्राप्त करता है, वह उपस्थ में ही लीन हो जाता है और यह उपस्थ, आनन्द स्वरूप विषयों को प्राप्त करता है, इस कारण यह आनन्द में विलय हो जाता है। यह आनन्द, प्रजापति के पास जाता है, इस कारण यह प्रजापति में विलीन हो जाता है। यह प्रजापति, नासीरा नाड़ी की ओर प्रस्थान करता है, अतः यह नासीरा में ही विलीन हो जाता है। यह नासीरा, कुर्मिर नाड़ी की ओर गमन करता है, इस कारण से यह कुर्मिर नाड़ी में ही लय होती है। यह कुर्मिर विज्ञान की ओर जाती है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकविहीन, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है।
(इसके बाद उन्होंने पुनः कहा कि) जो मन को प्राप्त करता है, वह मन में ही विलीन हो जाता है। यह मन, विचारणीय विषय को प्राप्त करता है, इस कारण से यह विचारणीय विषयों में लीन हो जाता है, यह विचारणीय, चन्द्रमा की तरफ गमन कर जाता है, इसलिए यह चन्द्रमा में ही लय हो जाता है, यह चन्द्रमा, शिशु नाड़ी की ओर गमन करता है, इस कारण यह शिशु में ही विलीन हो जाता है. यह शिशु नाड़ी श्येन की ओर गमन करती है, इस कारण वह श्येन में ही लय होती है, यह श्येन, विज्ञान की तरफ गमन करता है, इस कारण से यह विज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त होता है।
(ऐसा कहने के उपरान्त उन्होंने फिर कहा कि) जो बुद्धि को प्राप्त करता है, वह बुद्धि में ही विलीन हो जाता है। यह बुद्धि, जानने योग्य विषयों की और प्रस्थान कर जाती है, इस कारण यह जानने योग्य विषयों में ही विलीन हो जाती है। यह जानने का विषय, ब्रह्मा की ओर गमन कर जाता है, इसलिए यह ब्रह्मा में ही अस्त हो जाता है, यह ब्रह्मा सूर्या नाड़ी को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय सूर्या में ही हो जाता है, यह सूर्या कृष्ण को प्राप्त करती है, इसलिए यह कृष्ण में ही विलीन हो जाती है, यह कृष्ण, विज्ञान को प्राप्त करता है इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है और यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त हो जाता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है।
(इस प्रकार कहने के पश्चात् उन महर्षि ने कहा कि) जो अहंकार को प्राप्त करता है, वह अहंकार में ही विलीन हो जाता है। यह अहंकार, कर्त्तव्य को प्राप्त करता है, इसलिए यह कर्त्तव्य में ही लय हो जाता है। यह कर्त्तव्य, रुद्र को प्राप्त करता है, इस कारण इसका लय रुद्र में ही होता है, यह रुद्र, असुरा नाड़ी को प्राप्त करता है, इसलिए इस रुद्र का विलय असुरा नाड़ी में ही हो जाता है। यह असुरा नाड़ी श्वेत को प्राप्त करती है, अतः इस असुरा का विलय श्वेत में ही होता है। यह श्वेत, विज्ञान को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीय को ही प्राप्त होता है।
(इस प्रकार कहने के बाद पुनः उन्होंने कहना शुरू किया कि) जो चित्त को प्राप्त कर लेता है, वह चित्त में ही विलीन हो जाता है। यह चित्त, चिन्तन योग्य को पा लेता है, इस कारण यह चिन्तन करने योग्य में ही लय हो जाता है। यह चिन्तन करने योग्य, क्षेत्रज्ञ को प्राप्त कर लेता है, इस कारण इसका विलय क्षेत्रज्ञ में ही होता है। यह क्षेत्रज्ञ, भारवती नाड़ी में गमन कर जाता है, इस कारण यह भास्वती नाड़ी में ही विलीन हो जाता है। यह भास्वती, नाग वायु के पास जाती है, इस कारण यह नाग वायु में ही अस्त हो जाती है। यह नाग वायु, विज्ञान की ओर जाती है, इस कारण यह विज्ञान में विलय हो जाती है। यह विज्ञान, आनन्द को प्राप्त कर लेता है, इस कारण यह आनन्द में ही विलीन हो जाता है और वह आनन्द मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं निर्बोज तुरीय में जाता है, इस कारण से यह तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है।
यह आत्मा सैकड़ों तरह के प्रवचन करने मात्र से नहीं प्राप्त होता, अनेकों शास्त्रों का अध्ययन करने से भी नहीं मिलता, बुद्धि तथा ज्ञान का सानिध्य प्राप्त कर लेने से भी यह आत्मा प्राप्त नहीं होता। वैसे ही मेधा, वेदों, यज्ञों, उग्र-तपश्चर्या, सांख्यज्ञान, योग, आश्रम अथवा अन्य दूसरे प्रयत्नों से भी वह आत्मा प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म में निष्ठा रखने वाला जो मनुष्य प्रवचन के द्वारा, प्रशंसा (गुरु सेवा) के द्वारा तथा व्युत्थान (सामान्य जीवन क्रम से ऊपर उठकर) के द्वारा आत्मज्ञानपूरक शास्त्रों का श्रवण करता हुआ शम, दम, उपरति एवं तितिक्षा में स्थित होकर समाधिनिष्ठ हुआ आत्मा को आत्मा में ही देखता है, वही आत्म तत्त्व को प्राप्त कर पाता है। जो भी मनुष्य इस तरह से आत्मतत्त्व को जानता है, वह सभी का आत्मा हो जाता है।