जिह्वामेवाप्येति यो जिह्वामेवास्तमेति रसयितव्यमेवाप्येति यो रसयितव्यमेवास्तमेति वरुणमेवाप्येति यो वरुणमेवास्तमेति सौम्यामेवाप्येति यः सौभ्यामेवास्तमेत्युदानमेवाच्येति य उदानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत होवाच ॥
इसी प्रकार जो पदार्थ जिह्वा के प्रति प्रकट होते हैं, वे जिह्वा में ही विलीन हो जाते हैं। जो जिह्वा, रसमितव्य के प्रति प्रकट होती है, यह रसमितव्य में ही विलीन हो जाती है। जो रसमितव्य, वरुण को प्राप्त होता है, वह वरुण में ही विलीन हो जाता है। जो वरुण, सौम्या नामक नाड़ी को प्राप्त होता है, वह सौम्या में ही विलीन हो जाता है। जो सौम्या, उदान के प्रति प्रकट होती है, वह उदान में ही अस्त हो जाती है। जो उदान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही लय हो जाता है। यह विज्ञान अमृत, भयरहित, सोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म को प्राप्त होता है।
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