हस्तमेवाप्येति यो हस्तमेवास्तमेत्यादातव्यमेवाप्येति य आदातव्यमेवास्तमे-तीन्द्रमेवाप्येति य इन्द्रमेवास्तमेत्यमृतामेवाप्येति योऽमृतामेवास्तमेति मुख्यमेवाप्येति यो मुख्यमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत होवाच ॥
(ऐसा कहने के पश्चात् उन घोराङ्गिरस ने पुनः कहना प्रारम्भ किया कि) जो हाथ को प्राप्त कर लेता है, वह हाथ में ही विलीन हो जाता है। यह हाथ, लेने योग्य पदार्थ के प्रति गमन करता है, अतः यह लेने वाले पदार्थ में ही लीन होता है, यह पदार्थ, इन्द्र के प्रति प्रस्थान करता है, इस कारण से यह इन्द्र में ही विलीन हो जाता है, यह इन्द्र, अमृता नाड़ी के प्रति जाता है, इस कारण यह अमृता में ही अस्त हो जाता है, यह अमृता, मुख्य के पास जाती है, अतः मुख्य में ही अस्त हो जाती है, यह मुख्य, विज्ञान के पास जाता है, इस कारण से विज्ञान में ही अपने को विलीन कर लेता है और यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण यह अमर, निर्भय, अशोक एवं अन्तरहित तथा बीजविहीन तुरीयावस्था को ही प्राप्त कर लेता है।
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