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सुबाल • अध्याय 9 • श्लोक 15
य एवं निर्बीजं वेद निर्बीज एव स भवति न जायते न प्रियते न मुहाते न भिद्यते न दह्यते न छिद्यते न कम्पते न कुप्यते सर्वदहनो ऽवमात्मेत्याचक्षते ॥
(उन घोङ्गिरस जी ने पुनः कहा कि) जो भी मनुष्य इस तरह से निर्बीज रूपी तत्व को जान लेता है, यह निर्बीज हो जाता है। यह अजन्मा हो जाता है, मृत्यु एवं मोह को भी नहीं प्राप्त करता। उसका भेदन नहीं होता, जलता भी नहीं, छेदा भी नहीं जाता, कम्पायमान भी नहीं होता तथा कुपित भी नहीं होता है। इस प्रकार सभी कुछ दग्ध करने वाली यह आत्मा ही है, ऐसा शास्त्रवेत्ताओं का मत है।
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