अथ हैनं रैक्वः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वेऽस्तं गच्छन्तीति। तस्मै स होवाच चक्षुरेवाप्येति यच्चक्षुरेवास्तमेति द्रष्टव्यमेवाप्येति यो द्रष्टव्यमेवास्तमेत्यादित्यमेवाप्येति व आदित्यमेवास्त-मेति बिराजामेवाप्येति यो विराजामेवास्तमेति प्राणमेवाप्येति यः प्राणमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्बेति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥
इसके पश्चात् रैक ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया हे भगवन्! ये समस्त पदार्थ किसमें अस्त होते हैं? (पह सुनकर) घोराङ्गिरस ने रैक को उत्तर दिया जो पदार्थ चक्षु के प्रति प्राप्त (प्रकट) होते हैं (दिखाई देते हैं), वे अक्षु (अपने अन्तर्यामी) में हो अस्त हो जाते हैं। जो द्रव्य पदार्थ आदित्य के प्रति प्रकट होता है, यह आदित्य में ही विलीन हो जाता है। जो आदित्य विराजा (सुमुक्षा नामक नाड़ी का ही एक नाम) के प्रति प्रकट होता है, यह विराजा में ही विलीन हो जाता है। जो विराजा प्राण के प्रति प्रकट होती है, वह प्राण में ही विलीन हो जाती है। जो प्राण, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। जो विज्ञान, आनन्द के प्रति प्रकट होता है, वह आनन्द में ही अस्त होता है। जो आनन्द, तुरीय के प्रति प्रकट होता है, यह तुरीय में ही अस्त होता है। वह तुरीय अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म को प्राप्त होता है।
(जिस-जिस संज्ञा वाली नाड़ियाँ मनुष्य में होती हैं, वे सभी मूलतः विराट् पुरुष में भी होती हैं, जिस तरह विराट् पुरुष-परमात्मा का अंश आत्मा है, वैसे ही नाड़ियाँ भी विराट् के नाड़ी तंत्र की अंग हैं। आदित्य आदि देवों का प्राकट्य और विलय उन्हीं के प्रति कहा गया है। आगे के मंत्रों में भी अधिदेवता का विलय जिन नाड़ियों में कहा गया है, वे सभी विराट् की नाड़ियाँ ही मान्य हैं।)
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