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अध्याय 12 — स्वप्रकाशता

प्रबोधसुधाकर
5 श्लोक • केवल अनुवाद
यद्यपि सूर्य, चन्द्र, अग्नि और दीपक आदि अपने और पराये सबके प्रकाशक हैं, तथापि इनसे आत्मा कभी प्रकाशित नहीं होता।
तथा इनका भान भी चक्षुन्द्रिय द्वारा परमात्मा से ही होता है। अथवा यों कहो कि यदि नेत्रेन्द्रिय द्वारा आत्मा सहायक न होता तो केवल प्रकाश से ही इन पदार्थो का भी ज्ञान नहीं हो सकता था।
यदि हो सकता तो प्रकाश के रहते हुए भी अन्धा पुरुष पदार्थों को क्यों नहीं देख लेता?
यदि कहो कि आत्मा के रहते हुए (नेत्रेन्द्रिय के अभाव में भी) अन्धे मनुष्य को पदार्थ का ज्ञान क्यों नहीं होता? सो उसे अन्य इन्द्रियों से ज्ञान होता ही है, क्योंकि अन्धे मनुष्य को नेत्र बन्द होने पर भी हाथ से छूकर पदार्थ का ज्ञान हो ही जाता है।
उपनिषदों का कथन है कि 'जिसके द्वारा सब कुछ जाना जाता है उस (आत्मा) को किससे जाने'। अतः आत्मा तो आत्मा से ही जाना जाता है।
Krishjan
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