तत्राप्यक्षिद्वारा सहायभूतो न चेदात्मा ।
नो चेत्सत्यालोके पश्यत्यन्धः कथं नार्थान् ॥
यदि हो सकता तो प्रकाश के रहते हुए भी अन्धा पुरुष पदार्थों को क्यों नहीं देख लेता?
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