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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 12 • श्लोक 4
सत्यात्मन्यपि किं नो ज्ञानं तच्चेन्द्रियान्तरेण स्यात् । अन्धे दृक्प्रतिबन्धे करसंबन्धे पदार्थभानं हि ॥
यदि कहो कि आत्मा के रहते हुए (नेत्रेन्द्रिय के अभाव में भी) अन्धे मनुष्य को पदार्थ का ज्ञान क्यों नहीं होता? सो उसे अन्य इन्द्रियों से ज्ञान होता ही है, क्योंकि अन्धे मनुष्य को नेत्र बन्द होने पर भी हाथ से छूकर पदार्थ का ज्ञान हो ही जाता है।
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