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अध्याय 3 — तृतीयोऽध्यायः

पैंगल
12 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके पश्चात् पैङ्गल ऋषि ने याज्ञवल्क्य से कहा - ‘मुझे महावाक्यों का विवरण समझाइये'।
याज्ञवल्क्य बोले - ‘वह तुम हो’ (तत्त्वमासि), ‘तुम वह हो’ (त्वं तदसि), ‘तुम ब्रह्म हो’ (त्वं ब्रह्मासि), ‘मैं ब्रह्म हूँ’ (अहं ब्रह्मास्मि), ये महावाक्य हैं, जिन पर अनुसन्धान (विचार) करना चाहिए।
‘तत्त्वमसि’ में ‘तत्’ पद सर्वज्ञत्व आदि लक्षण से युक्त, माया की उपाधि से युक्त, सच्चिदानन्द रूप, जगत् योनि (मूलकारण) रूप अव्यक्त ईश्वर का बोधक है। वही ईश्वर अन्तःकरण की उपाधि के कारण भिन्नता का बोध होने से ‘त्वं’ पद का आलम्बन लेकर प्रकट किया जाता है। ईश्वर की उपाधि माया और जीव की उपाधि अविद्या है, इनका परित्याग कर देने से ‘तत्’ और ‘त्वं’ पदों का लक्ष्य (आशय) उसे ब्रह्म से है, जो प्रत्यगात्मा से अभिन्न है।
‘तत्त्वमसि’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इन महावाक्यों के अर्थ पर विचार करना श्रवण कहलाता है। श्रवण किए हुए विषय के अर्थों का एकान्त में अनुसन्धान करना मनन कहलाता है। श्रवण और मनन द्वारा निर्णीत अर्थ रूप वस्तु में एकाग्रतापूर्वक चित्त का स्थापन निदिध्यासन कहलाता है। जब ध्याता और ध्यान के भाव को छोड़कर चित्तवृत्ति वायु रहित स्थान में रखे दीपक की ज्योति के सदृश केवल ध्येय में स्थिर हो जाती है, तब उस अवस्था को समाधि कहते हैं।
उसमें (उस अवस्था में) आत्मगोचर वृत्तियाँ उत्पन्न होकर अज्ञात हो जाती हैं, जो स्मरण के द्वारा अनुमानित होती हैं (अर्थात् जिनका स्मरण के द्वारा अनुमान लगाया जाता है)। संसार में अनादिकाल से संचित करोड़ों कर्म इस अवस्था में ही विनष्ट हो जाते हैं। इसके पश्चात् अभ्यास पटुता (परिपक्वता) प्राप्त हो जाने पर सतत सहस्त्रो अमृत धाराओं की वर्षा होती रहती है। इसीलिए योगज्ञाता समाधि को धर्ममेघ कहते हैं। इसके माध्यम से सम्पूर्ण वासनाजाल नि:शेष (समाप्त) हो जाता है तथा पाप और पुण्य दोनों प्रकार के संचित कर्म समूल विनष्ट हो जाते हैं। यह स्थिति प्राप्त होने पर, प्राक् (पहले) जो, ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का आशय परोक्ष रूप से विदित होता था, वही अब हस्तामलकवत् अवरोध रहित स्पष्ट विदित होने लगता है और ब्रह्म का साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है, तब योगी जीवन्मुक्त हो जाता है।
ईश्वर ने पञ्चीकृत भूतों का पुनः अपञ्चीकरण करने की कामना की। अतः उसने ब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्गत लोकों को कार्य रूप से पुनः कारण रूप प्राप्त करा दिया। इसके बाद उसने सूक्ष्म अङ्ग, कर्मेन्द्रियों, प्राणों, ज्ञानेन्द्रियों और अन्त:करण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को एकीकृत करके समस्त भौतिक पदार्थों को उनके कारणभूत पंचक में संयोजित करके भूमि को जल में, जल को अग्नि में, अग्नि को वायु में, वायु को आकाश में, आकाश को अहंकार में, अहंकार को महत् (विराट्) में, विराट् को अव्यक्त में और अव्यक्त को पुरुष में क्रमशः विलीन कर दिया। इस प्रकार विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर भी उपाधियों के विलीन हो जाने पर परमात्मा में ही विलीन हो जाते हैं।
पञ्चीकृत महाभूतों द्वारा निर्मित और संचित कर्मों से प्राप्त स्थूल देह, कर्मों के क्षय हो जाने तथा सत्कर्मों के परिपाक होने से अपञ्चीकृत हो जाती है। वह देह, सूक्ष्मरूप से एकीभूत होकर, कारण रूप को प्राप्त होकर अन्त में उस कारण के भी कारण कूटस्थ प्रत्यगात्मा में विलीन हो जाती है। फिर विश्व, तैजस और प्राज्ञ की भी अपनी-अपनी उपाधियों के लय हो जाने से ये सभी प्रत्यगात्मा में विलीन हो जाते हैं।
अण्ड (ब्रह्माण्ड) अपनी कारण सत्ता के साथ ज्ञानाग्नि में भस्म होकर परमात्मा में विलीन हो जाता है। इस प्रकार ब्राह्मण (ब्रह्म में रत) पुरुष को समाहित चित्त (ब्रह्म में चित्त को समाहित करके) होकर सदैव ‘तत्’ और ‘’त्वं’ पदों के साथ ऐक्य करते रहना चाहिए। इस प्रक्रिया से उसी प्रकार आत्म साक्षात्कार होने लगता है, जिस प्रकार मेघों के छँट जाने से अंशुमान् (सूर्य) का प्रकाश प्रकट हो जाता है।
कलश के अन्दर स्थित दीपक के सदृश, शरीर में स्थित (हृदय कमल के मध्यस्थित) धूम रहित ज्योति स्वरूप आश परिमाण आत्मा का ध्यान करके जो मुनि अन्तःप्रान्त में स्थित
प्रकाशयुक्त कूटस्थ, अव्यय आत्मा का ध्यान नित्य सोते समय तथा मृत्यु के समय भी करता है, वह जीवन्मुक्त है, धन्य है, कृतकृत्य है, ऐसा मानना चाहिए।
जीवन्मुक्तत्व (जीवन्मुक्त स्थिति) को छोड़कर वह इस शरीर का परित्याग करके अदेह और मुक्ति को उसी प्रकार प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार पवन स्पन्दन रहित हो जाता है अर्थात् पवन का प्रवाह बन्द हो जाता है।
तत्पश्चात् वह अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अरस और अगन्धवत् होकर अव्यय, अनादि, अनन्त, महत् से भी परे, ध्रुव, निर्मल तथा निरामय ब्रह्म ही शेष बचता है।
Krishjan
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