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पैंगल • अध्याय 3 • श्लोक 8
अण्डं ज्ञानाग्निना दग्धं कारणै:सह परमात्मनि लीनं भवति। ततो ब्राह्मणः समाहितो भूत्वा तत्त्वंपदैक्यमेव सदा कुर्यात् । ततो मेघापायेंऽशुमानिवात्माऽऽविर्भवति ॥
अण्ड (ब्रह्माण्ड) अपनी कारण सत्ता के साथ ज्ञानाग्नि में भस्म होकर परमात्मा में विलीन हो जाता है। इस प्रकार ब्राह्मण (ब्रह्म में रत) पुरुष को समाहित चित्त (ब्रह्म में चित्त को समाहित करके) होकर सदैव ‘तत्’ और ‘’त्वं’ पदों के साथ ऐक्य करते रहना चाहिए। इस प्रक्रिया से उसी प्रकार आत्म साक्षात्कार होने लगता है, जिस प्रकार मेघों के छँट जाने से अंशुमान् (सूर्य) का प्रकाश प्रकट हो जाता है।
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