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अध्याय 2 — द्वितीयः खण्डः

केन
5 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि तुम यह सोचते हो कि ‘मैं ब्रह्म को भली-भाँति जानता हूँ’, तो निश्चय ही तुमने ब्रह्म के स्वरूप को बहुत थोड़ा ही जाना है — चाहे देवताओं में या अपने भीतर। इसलिए, मुझे लगता है कि तुम्हें अभी ब्रह्म का और विचार (अनुसंधान) करना चाहिए।
मैं यह नहीं मानता कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ; पर यह भी नहीं कि मैं उसे नहीं जानता। जो हमारे बीच इसे जानता है, वही वास्तव में जानता है — जो यह समझता है कि ‘मैं नहीं जानता’, वही (वास्तव में) जानता है।
जिसके लिए (ब्रह्म) ‘अमत’ (अज्ञेय, विचार से परे) है, उसी के लिए वह ‘मत’ (सम्यक् ज्ञात) है; और जो इसे ‘ज्ञात’ मानता है, वह वास्तव में नहीं जानता। ज्ञानी जनों के लिए यह अविज्ञात (अज्ञेय) है, और अज्ञानी के लिए यह ज्ञात (जाने जाने योग्य वस्तु) प्रतीत होता है।
प्रत्येक बोध (ज्ञान-अनुभूति) में जो ज्ञात होता है, वही (ब्रह्म) सम्यक् ज्ञात है; क्योंकि उसी के द्वारा अमरत्व प्राप्त होता है। मनुष्य आत्मा के द्वारा शक्ति (सामर्थ्य) प्राप्त करता है, और विद्या (सच्चे ज्ञान) के द्वारा अमरत्व प्राप्त करता है।
यदि यहाँ (इस जीवन में) उसे जान लिया, तो यही सत्य (जीवन की सिद्धि) है; और यदि यहाँ नहीं जाना, तो महान विनाश है। ज्ञानी पुरुष सभी प्राणियों में उसी (आत्मा/ब्रह्म) को भली-भाँति पहचानकर, इस संसार से परे जाकर अमर हो जाते हैं।
Krishjan
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