जिसके लिए (ब्रह्म) ‘अमत’ (अज्ञेय, विचार से परे) है, उसी के लिए वह ‘मत’ (सम्यक् ज्ञात) है; और जो इसे ‘ज्ञात’ मानता है, वह वास्तव में नहीं जानता।
ज्ञानी जनों के लिए यह अविज्ञात (अज्ञेय) है, और अज्ञानी के लिए यह ज्ञात (जाने जाने योग्य वस्तु) प्रतीत होता है।
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