यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥
यदि तुम यह मानते हो कि "मैं ब्रह्म को भली-भाँति जानता हूँ", तो निश्चय ही तुमने ब्रह्म के स्वरूप को बहुत ही अल्प जाना है—चाहे उसे तुम अपने में जानते हो अथवा देवताओं में। इसलिए मैं समझता हूँ कि तुम्हारे लिए ब्रह्म का अभी और भी विचार एवं अनुसन्धान करना शेष है।
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