यदि मनुष्य इस जीवन में हीब्रह्म को जान लेता है, तो उसका जीवन सार्थक हो जाता है; और यदि वह इस जीवन में उसे नहीं जान पाता, तो यह महान् हानि है।
धीर पुरुष(तत्त्वदर्शी) समस्त प्राणियों में उसी एक आत्मतत्त्व का विवेकपूर्वक दर्शन करके, इस संसार से मुक्त होकर अमृतत्व(मोक्ष) को प्राप्त हो जाते हैं।
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