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अध्याय 66 — अथाश्वलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
5 श्लोक • केवल अनुवाद
दीर्घ प्रोवा और नेत्रकोश वाला, विस्तीर्ण कटि और हृदय वाला, ताम्र वर्ण के तालु, ओंठ और जीभ वाला, सूक्ष्म चर्म, शिर के बाल और पूँछ वाला, सुन्दर शफ ( खुर), गति और मुख वाला, छोटे कान, ओंठ और पूँछ वाला, गोल जंघा, जानु और ऊरु वाला, बराबर और सफेद दाँत वाला तथा दर्शनीय आकार और शरीर की शोभा वाला सर्वांग शुद्ध घोड़ा सदा राजा के शत्रुओं के नाश के लिये होता है।
नेत्र के अधोभाग, हनु, मुख, कपोल, हृदय, गल (हृदय-कण्ठ की सन्धि), प्रोथ (नासिका का अधोभाग), शङ्ख (कान के समीप), कटि, बस्ति ( नाभि और लिङ्ग का मध्य), जानु, अण्डकोश, नाभि, ककुद (बाहु के पृष्ठभाग में कृकाटिका के समीप), गुदा, दक्षिण भाग का पेट, पाँव-इन अंगों में जिसके रोम का आवर्त हो, वह घोड़ा अशुभ होता है।
प्रपाण (ऊपर के ऑठ के तल), कण्ठ, कान, पीठ के मध्य भाग, नेत्रों केऊपर, भौहों के समीप, ओंठ, सक्यि (पिछला भाग), भुज (अगला भाग), जानु, कुधि (वाम भाग), पाचं, ललाट-इन अंगों में जिसके आवर्त हों, वह घोड़ा अत्यन्त शुभ फल देता है।
घोड़ों के देह में दश रोमाषर्त अवश्य होते हैं, इनको ध्रुवावर्त कहते हैं। जैसे प्रपाण और मस्तक के केश में एक-एक तथा रन्ध्र (कुधि और नाभि के मध्य भाग ), रन्ध्र के ऊपरी भाग, मस्तक, छाती- इन चार स्थानों में दो-दो, इस प्रकार दस ध्रुवा- वर्त होते हैं।
घोड़े के नीचे की दन्तपाली में दादों के बीच में छः दाँत व्यञ्जक होते हैं। दोनों प्रातियों के आगे के छ: दाँत सफेद हों तो एक वर्ष का और कृष्ण लोहित हों तो दो वर्ष का बडेरा होता है।
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