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बृहत्संहिता • अध्याय 66 • श्लोक 1
दीर्घभीवाक्षिकूटत्रिकाहृदयपृथुस्ताग्रताल्योष्ठजिह्नः सूक्ष्मत्वक्केशवालः सुशफगतिमुखो हस्वकणोंष्ठपुच्छः । अड्याजानूरुवृत्तः समसितदशनश्चारुसंस्थानरूपो वाजी सर्वाङ्गशुको भवति नरपतेः शत्रुनाशाय नित्यम् ॥१॥
दीर्घ प्रोवा और नेत्रकोश वाला, विस्तीर्ण कटि और हृदय वाला, ताम्र वर्ण के तालु, ओंठ और जीभ वाला, सूक्ष्म चर्म, शिर के बाल और पूँछ वाला, सुन्दर शफ ( खुर), गति और मुख वाला, छोटे कान, ओंठ और पूँछ वाला, गोल जंघा, जानु और ऊरु वाला, बराबर और सफेद दाँत वाला तथा दर्शनीय आकार और शरीर की शोभा वाला सर्वांग शुद्ध घोड़ा सदा राजा के शत्रुओं के नाश के लिये होता है।
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