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बृहत्संहिता • अध्याय 66 • श्लोक 3
ये प्रपाणगलकर्णसंस्थिताः पृष्ठमध्यनयनोपरि स्थिताः । ओष्ठसक्थिभुजकुक्षिपार्श्वगास्ते ललाटसहिताः सुशोभनाः ॥
प्रपाण (ऊपर के ऑठ के तल), कण्ठ, कान, पीठ के मध्य भाग, नेत्रों केऊपर, भौहों के समीप, ओंठ, सक्यि (पिछला भाग), भुज (अगला भाग), जानु, कुधि (वाम भाग), पाचं, ललाट-इन अंगों में जिसके आवर्त हों, वह घोड़ा अत्यन्त शुभ फल देता है।
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