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अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग

भगवद गीता
29 श्लोक • केवल अनुवाद
अर्जुन ने कहा - हे कृष्ण! पहले आपने कर्म संन्यास की सराहना की और आपने मुझे भक्ति युक्त कर्मयोग का पालन करने का उपदेश भी दिया। कृपापूर्वक अब मुझे निश्चित रूप से अवगत कराएँ कि इन दोनों में से कौन सा मार्ग अधिक लाभदायक है।
परम भगवान ने कहा - कर्म संन्यास और कर्मयोग दोनों मार्ग परम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं लेकिन कर्मयोग कर्म संन्यास से श्रेष्ठ है।
वे कर्मयोगी जो न तो कोई कामना करते हैं और न ही किसी से घृणा करते हैं उन्हें नित्य संन्यासी माना जाना चाहिए। हे महाबाहु अर्जुन! सभी प्रकार के द्वन्द्वों से मुक्त होने के कारण वे माया के बंधनों से सरलता से मुक्ति पा लेते हैं।
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोग को अलग-अलग फल वाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि इन दोनों में से एक साधन में भी अच्छी तरह से स्थित मनुष्य दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
सांख्ययोगियों के द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों के द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्य योग और कर्मयोग को (फलरूप में) एक देखता है, वही ठीक देखता है।
परन्तु हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वश में है और सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
तत्त्व को जानने वाला सांख्य योगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता है।
और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं ऐसा समझकर - 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' - ऐसा माने।
जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मों को भगवान् में अर्पण करके और आसक्ति का त्याग करके कर्म करता है, वह जल से कमल के पत्ते की तरह पाप से लिप्त नहीं होता।
कर्मयोगी आसक्ति का त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँ-शरीर-मन-बुद्धि के द्वारा केवल अन्तःकरण की शुद्धि के लिये ही कर्म करते हैं।
कर्मयोगी कर्मफल का त्याग करके नैष्ठि की शान्ति को प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामना के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है।
जिसकी इन्द्रियाँ और मन वश में हैं, ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारों वाले शरीररूपी पुर में सम्पूर्ण कर्मों का विवेकपूर्वक मन से त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूप में) स्थित रहता है।
परमेश्वर मनुष्यों के न कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के साथ संयोग की रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।
सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न शुभकर्म को ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, उसी से सब जीव मोहित हो रहे हैं।
परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान (विवक) के द्वारा उस अज्ञान का नाश कर दिया है, उनका वह ज्ञान सूर्य की तरह परमतत्त्व परमात्मा को प्रकाशित कर देता है।
जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्व में है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञान के द्वारा पाप रहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं।
ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखने वाले होते हैं।
जिनका अन्तःकरण समता में स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
जो प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्म को जानने वाला मनुष्य ब्रह्म में स्थित है।
बाह्यस्पर्श में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में जो सुख है, उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित मनुष्य अक्षय सुख का अनुभव करता है।
क्योंकि हे कुन्तीनन्दन! जो इन्द्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होने वाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्त वाले और दुख के ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उन में रमण नहीं करता।
इस मनुष्य-शरीर में जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटने से पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है।
जो मनुष्य केवल परमात्मा में सुख वाला है और केवल परमात्मा में रमण करने वाला है तथा जो केवल परमात्मा में ज्ञान वाला है, वह ब्रह्म में अपनी स्थिति का अनुभव करने वाला सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होता है।
जिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियों सहित वश में है, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
काम-क्रोध से सर्वथा रहित, जीते हुए मन वाले और स्वरूप का साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियों के लिये दोनों ओर से शरीर के रहते हुए अथवा शरीर छूटने के बाद निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है।
बाह्य पदार्थों को बाहर ही छोड़कर और नेत्रों की दृष्टि को भौंहों के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके।
जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वश में हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोध से सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
भक्त मुझे सब यज्ञों और तपों का भोक्ता, सम्पूर्ण लोकों का महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियों का सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर शान्ति को प्राप्त हो जाता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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