ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः।।
क्योंकि हे कुन्तीनन्दन! जो इन्द्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होने वाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्त वाले और दुख के ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उन में रमण नहीं करता।
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