अध्याय 5 — पञ्चमोध्यायः
ऐतरेय
4 श्लोक • केवल अनुवाद
यह जो हृदय है और मन है — यही (आत्मा के साधन) हैं।
संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा (बुद्धि), दृष्टि, धृति (धारण-शक्ति), मति, मनीषा (गंभीर विचार-शक्ति), जूति (प्रेरणा/तेज), स्मृति, संकल्प, क्रतु (निश्चय), असु (प्राण), काम और वश (इच्छा/नियंत्रण) — ये सभी वास्तव में प्रज्ञान (चेतना) के ही नाम हैं।
यह (आत्मा) ही ब्रह्म है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति है। ये सभी देवता तथा ये पाँच महाभूत — पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज (अग्नि) — और ये छोटे-छोटे मिश्रित पदार्थ; और अन्य सब बीज, तथा विभिन्न प्रकार के जन्म वाले जीव — अण्डज (अंडे से उत्पन्न), जरायुज (गर्भ से उत्पन्न), स्वेदज (पसीने/नमी से उत्पन्न) और उद्भिज्ज (भूमि से उत्पन्न); घोड़े, गौएँ, मनुष्य, हाथी — जो कुछ भी यह प्राणी जगत है, चलने वाले (जंगम), उड़ने वाले (पक्षी), और स्थिर (स्थावर) — यह सब प्रज्ञान (चेतना) द्वारा संचालित है, प्रज्ञान में ही प्रतिष्ठित है।
प्रज्ञान ही इन लोकों का नेत्र (मार्गदर्शक) है, प्रज्ञान ही आधार है — और प्रज्ञान ही ब्रह्म है।”