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ऐतरेय • अध्याय 5 • श्लोक 2
यदेतद्धृदयं मनश्चैतत्‌। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिधृ। र्तिमतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति। सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवंति ॥
जो यह हृदय है, वही वास्तव में मन है। और इसी एक चेतन तत्त्व को विभिन्न रूपों में कहा जाता है— संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति, स्मृति, संकल्प, क्रतु, असु, काम, वश— ये सभी नाम वास्तव में उसी एक प्रज्ञान (चेतन-बोध) के हैं। अर्थात समस्त मानसिक और बौद्धिक अवस्थाएँ एक ही चेतना की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।
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