ॐ कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स आत्मा।
येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गंधानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥
ॐ “यह आत्मा कौन है?”
जिससे मनुष्य—
देखता है (दर्शन)
सुनता है (श्रवण)
गंध का अनुभव करता हैवाणी को व्यक्त करता हैस्वाद को जानता है (प्रिय-अप्रिय का विवेक)
अर्थात प्रश्न यह है कि इन सभी इन्द्रिय-क्रियाओं के पीछे वह एक ही चेतन तत्त्व कौन है?
उत्तर की दिशा यह है कि यह सब अलग-अलग क्रियाएँ नहीं, बल्कि एक ही आत्म-चेतना के विभिन्न प्रकट रूप हैं—जो इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करता है, पर स्वयं इन्द्रिय नहीं है।
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