स एतेन प्राज्ञेनाऽऽत्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥
वह प्राज्ञ आत्मा(चेतन-बोधस्वरूप आत्मा) इस लोक से उत्क्रमण करके उस स्वर्गलोक में जाता है।
वहाँ वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और अमृत स्वरूप हो जाता है—पूर्ण, तृप्त और अविनाशी अवस्था को प्राप्त करता है।
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