एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्शुद्रमिश्राणीव।
बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥
यह (आत्मा) ही ब्रह्म है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति है। ये सभी देवता तथा ये पाँच महाभूत — पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज (अग्नि) — और ये छोटे-छोटे मिश्रित पदार्थ; और अन्य सब बीज, तथा विभिन्न प्रकार के जन्म वाले जीव — अण्डज (अंडे से उत्पन्न), जरायुज (गर्भ से उत्पन्न), स्वेदज (पसीने/नमी से उत्पन्न) और उद्भिज्ज (भूमि से उत्पन्न); घोड़े, गौएँ, मनुष्य, हाथी — जो कुछ भी यह प्राणी जगत है, चलने वाले (जंगम), उड़ने वाले (पक्षी), और स्थिर (स्थावर) — यह सब प्रज्ञान (चेतना) द्वारा संचालित है, प्रज्ञान में ही प्रतिष्ठित है।
प्रज्ञान ही इन लोकों का नेत्र (मार्गदर्शक) है, प्रज्ञान ही आधार है — और प्रज्ञान ही ब्रह्म है।”
पूरा ग्रंथ पढ़ें
ऐतरेय के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।