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अध्याय 29 — अध्याय 29

यजुर्वेद
60 श्लोक • केवल अनुवाद
हे (जातवेदः) प्रसिद्ध बुद्धिमान् (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् जन ! जैसे (समिद्धः) सम्यक् जलाया (अञ्जन्) प्रकट होता हुआ अग्नि (मतीनाम्) मनुष्यों के (कृदरम्) पेट और (मधुमत्) बहुत उत्तम गुणोंवाले (घृतम्) जल वा घी को (पिन्वमानः) सेवन करता हुआ जैसे (वाजी) वेगवान् मनुष्य (वाजिनम्) शीघ्रगामी घोड़े को (वहन्) चलाता वैसे (देवानाम्) विद्वानों के (सधस्थम्) साथ स्थिति को (आ) प्राप्त करता है, वैसे (प्रियम्) प्रीति के निमित्तस्थान को (वक्षि) प्राप्त कीजिए ।
हे (सप्ते) घोड़े के समान वेग से वर्त्तमान विद्वान् जन ! जैसे (वाजी, अपि) वेगवान् भी अग्नि (घृतेन) घी वा जल से (अञ्जन्) प्रगट हुआ (देवयानान्) विद्वान् लोग जिन में चलते हैं, उन (पथः) मार्गों को (सम्, एतु) सम्यक् प्राप्त होवे, उसको (प्रजानन्) अच्छे प्रकार जानते हुए आप (देवान्) विद्वानों को (एहि) प्राप्त हूजिये, जिससे (त्वा) आपके (अनु) अनुकूल (प्रदिशः) सब दिशा-विदिशाओं को (सचन्ताम्) सम्बन्ध करें। आप (अस्मै) इस (यजमानाय) यज्ञ करनेवाले पुरुष के लिए (स्वधाम्) अन्न को (धेहि) धारण कीजिए ।
हे (वाजिन्) प्रशंसित वेगवाले (सप्ते) घोड़े के तुल्य पुरुषार्थी उत्साही कारीगर विद्वन् ! जिस कारण (जातवेदाः) प्रसिद्ध भोगोंवाले (सजोषाः) समान प्रीतियुक्त हुए आप (वसुभिः) पृथिवी आदि (देवैः) दिव्य गुणोंवाले पदार्थों के साथ (प्रीतम्) प्रशंसा को प्राप्त (वह्निम्) यज्ञ में होमे हुए पदार्थों को मेघमण्डल में पहुँचानेवाले अग्नि को (वहतु) प्राप्त कीजिये और जिस (त्वा) आप को (अग्निः) अग्नि पहुँचावे। इसलिए आप (ईड्यः) स्तुति के योग्य (च) भी (असि) हैं, (वन्द्यः) नमस्कार करने योग्य (च) भी हैं (च) और (आशुः) शीघ्रगामी (च) तथा (मेध्यः) समागम करने योग्य (असि) हैं।
हे विद्वन् ! हम लोग जैसे (पृथिव्याम्) भूमि में (उरु) बहुत (पृथु) विस्तीर्ण (प्रथमानम्) प्रख्यात (स्तीर्णम्) सब ओर से अङ्ग उपाङ्गों से पूर्ण यान और (बर्हिः) जल वा अन्तरिक्ष को (जुषाणा) सेवन करती हुई (सजोषाः) समान गुणवालों ने सेवन की (देवेभिः) दिव्य पदार्थों से (युक्तम्) युक्त (स्योनम्) सुख को (कृण्वाना) करती हुई (अदितिः) नाशरहित बिजुली सब को (सुविते) प्रेरणा किये यन्त्र में (दधातु) धारण करे, उस को (सुष्टरीम) सुन्दर रीति से विस्तार करे, वैसे आप भी प्रयत्न कीजिए।
हे मनुष्यो ! जैसे (वः) तुम्हारी (एताः) ये दीप्ति (सुभगाः) सुन्दर ऐश्वर्यदायक (विश्वरूपाः) विविध प्रकार के रूपोंवाले (ऋष्वाः) बड़े ऊँचे चौड़े (कवषाः) जिन में बोलने से शब्द की प्रतिध्वनि हो (शुम्भमानाः) सुन्दर शोभायुक्त (सती) हुए (देवीः) रङ्गों से चिलचिलाते हुए (उत्, आतैः) उत्तम रीति से निरन्तर जाने के हेतु (पक्षोभिः) बायें दाहिने भागों से (श्रयमाणाः) सेवित पक्षियों की पङ्क्तियों के तुल्य (सुप्रायणाः) सुख से जाने के आधार (द्वारः) द्वार (वि, भवन्तु) सर्वत्र घरों में हों, वैसे (उ) ही आप लोग भी बनावें।
हे शिल्पविद्या के प्रचारक दो विद्वानो ! जैसे मैं (अन्तरा) भीतर शरीर में (मित्रावरुणा) प्राण तथा उदान (चरन्ती) प्राप्त होते हुए (यज्ञानाम्) सङ्गति के योग्य पदार्थों के (मुखम्) मुख्य भाग को (अभि, संविदाने) सब ओर से सम्यक् ज्ञान के हेतु (सुहिरण्ये) सुन्दर तेजयुक्त (सुशिल्पे) सुन्दर कारीगरी जिस में हो (उषासा) प्रातः तथा सायंकाल की वेलाओं को (ऋतस्य) सत्य के (यौनौ) निमित्त (इह) इस घर में (सादयामि) स्थापन करता हूँ, वैसे (वाम्) तुम दोनों मेरे लिए स्थापना करो।
हे दो विद्यार्थियो ! जो (प्रथमा) पहिले (सरथिना) रथ वालों के साथ वर्त्तमान (सुवर्णा) सुन्दर गोरे वर्णवाले दो विद्वान् (विश्वा) सब (भुवनानि) बसने के आधार लोकों को (पश्यन्तौ) देखते हुए (वाम्) तुम दोनों के (चोदना) प्रेरणारूप कर्मों को (मिमाना) जाँचते हुए (ज्योतिः) प्रकाश को (प्रदिशा) अच्छे प्रकार जानते तथा (दिशन्ता) उच्चारण करते हुए तुम को (होतारा) दानशील (देवौ) तेजस्वी विद्वान् करें, जैसे उनको मैं (अपिप्रयम्) तृप्त करता हूँ, वैसे (वाम्) तुम दोनों उन विद्वानों को प्राप्त होओ।
हे विद्वन् ! आप जो (आदित्यैः) पूर्ण विद्यावाले उत्तम विद्वानों ने उपदेश की (उपहूता) यथावत् स्पर्द्धा से ग्रहण की (भारती) सब विद्याओं को धारण और सब प्रकार की पुष्टि करने हारी वाणी (नः) हमारे लिए (यज्ञम्) सङ्गत हमारे योग्य बोध को सिद्ध करती है, उस के (सह) साथ (नः) हम को (वष्टु) कामनावाले कीजिए जो (रुद्रैः) मध्य कक्षा के विद्वानों ने उपदेश की (सरस्वती) उत्तम प्रशस्त विज्ञानयुक्त वाणी (नः) हम को (आवीत्) प्राप्त होवे, जो (सजोषाः) एक से विद्वानों ने सेवी (इडा) स्तुति की हेतु वाणी (वसुभिः) प्रथम कक्षा के विद्वानों ने उपदेश की हुई (यज्ञम्) प्राप्त होने योग्य आनन्द को सिद्ध करती है। हे मनुष्यो ! ये (देवीः) दिव्यरूप तीन प्रकार की वाणी हम को (अमृतेषु) नाशरहित जीवादि नित्य पदार्थों में धारण करें, उनको तुम लोग भी हमारे अर्थ (धत्त) धारण करो।
हे (होतः) ग्रहण करनेहारे जन ! तू जैसे (त्वष्टा) विद्या आदि उत्तम गुणों से शोभित विद्वान् (देवकामम्) विद्वानों की कामना करनेहारे (वीरम्) वीर पुरुष को (जजान) उत्पन्न करता है, जैसे (त्वष्टुः) प्रकाशरूप शिक्षा से (आशुः) शीघ्रगामी (अर्वा) वेगवान् (अश्वः) घोड़ा (जायते) होता है। जैसे (त्वष्टा) अपने स्वरूप से प्रकाशित ईश्वर (इदम्) इस (विश्वम्) सब (भुवनम्) लोकमात्र को (जजान) उत्पन्न करता है, उस (बहोः) बहुविध संसार के (कर्त्तारम्) रचनेवाले परमात्मा का (इह) इस जगत् में (यक्षि) पूजन कीजिए, वैसे हम लोग भी करें।
हे विद्वन् (देवलोकम्) सब को मार्ग दिखानेवाले विद्वानों के मार्ग को (प्रजानन्) अच्छे प्रकार जानते हुए जैसे (घृतेन) जल संयुक्त किया (अश्वः) शीघ्रगामी अग्नि (त्मन्या) आत्मा से (ऋतुशः) ऋतु-ऋतु में (देवान्) उत्तम व्यवहारों को (समक्तः) सम्यक् प्रकट करता हुआ (पाथः) अन्न को (उप, एतु) निकट से प्राप्त हूजिए (अग्निना) अग्नि के साथ (वनस्पतिः) किरणों का रक्षक सूर्य (स्वदितानि) स्वादिष्ठ (हव्या) भोजन के योग्य अन्नों को (वक्षत्) प्राप्त करे, वैसे आत्मा से वर्ताव कीजि।
हे विद्वन् (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी ! आप (सद्यः) शीघ्र (जातः) प्रसिद्ध हुए (प्रजापतेः) प्रजारक्षक ईश्वर के (तपसा) प्रताप से (वावृधानः) बढ़ते हुए (स्वाहाकृतेन) सुन्दर संस्काररूप क्रिया से सिद्ध हुए (हविषा) होम में देने योग्य पदार्थ से (यज्ञम्) यज्ञ को (दधिषे) धारते हो, जो (पुरोगाः) मुखिया वा अगुआ (साध्या) साधनों से सिद्ध करने योग्य (देवाः) विद्वान् लोग (हविः) ग्राह्य अन्न का (अदन्तु) भोजन करें, उन को (याहि) प्राप्त हूजिये।
हे (अर्वन्) घोड़े के तुल्य वेगवाले विद्वान् पुरुष ! (यत्) जब (समुद्रात्) अन्तरिक्ष (उत, वा) अथवा (पुरीषात्) रक्षक परमात्मा से (प्रथमम्) पहिले (जायमानः) उत्पन्न हुए वायु के समान (उद्यन्) उदय को प्राप्त हुए (अक्रन्दः) शब्द करते हो तब (हरिणस्य) हरणशील वीरजन (ते) आप के (बाहू) भुजा (श्येनस्य) श्येनपक्षी के (पक्षा) पंखों के तुल्य बलकारी हैं, यह (महि) महत् कर्म (जातम्) प्रसिद्ध (उपस्तुत्यम्) समीपस्थ स्तुति का विषय होता है।
हे (वसवः) विद्वान् ! जो (इन्द्रः) बिजुली (त्रितः) पृथिवी, जल और आकाश से (यमेन) नियमकर्त्ता वायु ने (दत्तम्) दिये अर्थात् उत्पन्न किये (एनम्) इस अग्नि को (आयुनक्) युक्त करती है (एनम्) इस को प्राप्त हो के (प्रथमः) विस्तीर्ण प्रख्यात विद्युत् (अध्यतिष्ठत्) सर्वोपरि स्थित होती है (गन्धर्वः) पृथिवी को धारण करता हुआ (अस्य) इस सूर्य की (रशनाम्) रस्सी के तुल्य किरणों की गति को (अगृभ्णात्) ग्रहण करता है, इस (सूरात्) सूर्यरूप से (अश्वम्) शीघ्रगामी वायु को (निरतष्ट) सूक्ष्म करता है, उस को तुम लोग विस्तृत करो ।
हे (अर्वन्) वेगवान् अग्नि के समान जन ! जिससे तू (गुह्येन) गुप्त (व्रतेन) स्वभाव तथा (त्रितः) कर्म, उपासना, ज्ञान से युक्त (यमः) नियमकर्त्ता न्यायाधीश के तुल्य (असि) है, (आदित्यः) सूर्य के तुल्य विद्या से प्रकाशित जैसा (असि) है, विद्वान् के सदृश (असि) है, (सोमेन) ऐश्वर्य के (समया) निकट (विपृक्तः) विशेषकर संबद्ध (असि) है। उस (ते) तेरे (दिवि) प्रकाश में (त्रीणि) तीन (बन्धनानि) बन्धनों को अर्थात् ऋषि, देव, पितृ ऋणों के बन्धनों को (आहुः) कहते हैं।
हे (अर्वन्) विज्ञानयुक्त विद्वान् जन ! (यत्र) जिस (दिवि) विद्या के प्रकाश में (ते) आप के (त्रीणि) तीन (बन्धनानि) बन्धनों को विद्वान् लोग (आहुः) कहते हैं, जहाँ (अप्सु) प्राणों में (त्रीणि) तन जहाँ (अन्तः) बीच में और (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (त्रीणि) तीन बन्धनों को (आहुः) कहते हैं और (ते) आप के (परमम्) उत्तम (जनित्रम्) जन्म को कहते हैं, जिससे (वरुणः) श्रेष्ठ हुए विद्वानों का (छन्त्सि) सत्कार करते हो (उतेव) उत्प्रेक्षा के तुल्य वे सब (मे) मेरे होवें।
हे (वाजिन्) घोड़े के तुल्य वेगादि गुणों से युक्त सेनाधीश ! जैसे मैं (ते) आप के (इमा) इन प्रत्यक्ष घोड़ों की (अवमार्जनानि) शुद्धि क्रियाओं और (इमा) इन (शफानाम्) खुरों के (सनितुः) रखने के नियम के (निधाना) स्थानों की (अपश्यम्) देखता हूँ (अत्र) इस सेना में (ते) आप के घोड़े की (याः) जो (भद्राः) सुन्दर शुभकारिणी (गोपाः) उपद्रव से रक्षा करनेहारी (रशनाः) लगाम की रस्सी (ऋतस्य) सत्य की (अभिरक्षन्ति) सब ओर से रक्षा करती हैं, उनको मैं देखूँ वैसे आप भी देखें।
हे विद्वन् ! मैं जैसे (मनसा) विज्ञान से (आरात्) निकट में (अवः) नीचे से (दिवा) आकाश के साथ (पतङ्गम्) सूर्य के प्रति (पतयन्तम्) चलते हुए (ते) आप के (आत्मानम्) आत्मास्वरूप को (अजानाम्) जानता हूँ और (अरेणुभिः) धूलिरहित निर्मल (सुगेभिः) सुखपूर्वक जिन में चलना हो, उन (पथिभिः) मार्गों से (जेहमानम्) प्रयत्न के साथ जाते हुए (पतत्रि) पक्षीवत् उड़नेवाले (शिरः) दूर से शिर के तुल्य गोलाकार लक्षित होते विमानादि यान को (अपश्यम्) देखता हूँ, वैसे आप भी देखिए ।
हे वीर पुरुष ! (ते) आप के (जिगीषमाणम्) शत्रुओं को जीतते हुए (उत्तमम्) उत्तम (रूपम्) रूप और (गोः) पृथिवी के (पदे) प्राप्त होने योग्य (अत्र) इस व्यवहार में (इषः) अन्नों के दानों को (आ, अपश्यम्) अच्छे प्रकार देखूँ (ते) आपका (मर्त्तः) मनुष्य (यदा) जब (भोगम्) भोग्य वस्तु को (आनट्) व्याप्त होता है, तब (आत्) (इत्) इसके अनन्तर ही (ग्रसिष्ठः) अति खानेवाले हुए आप (औषधीः) औषधियों को (अनु, अजीगः) अनुकूलता से भोगते हो।
हे (अर्वन्) घोड़े के तुल्य वर्त्तमान विद्वन् ! (ते) आप के (कनीनाम्) शोभायमान मनुष्यों के बीच वर्त्तमान (देवाः) विद्वान् (व्रातासः) मनुष्य (अनु, वीर्यम्) बल-पराक्रम के अनुकूल (अनु, ममिरे) अनुमान करें और (तव) आप की (सख्यम्) मित्रता को (अनु, ईयुः) अनुकूल प्राप्त हों (त्वा) आप के (अनु) अनुकूल (रथः) विमानादि यान (त्वा) आपके (अनु) अनुकूल वा पीछे आश्रित (मर्यः) साधारण मनुष्य (त्वा) आपके (अनु) अनुकूल वा पीछे (गावः) गौ और (त्वा) आप के (अनु) अनुकूल (भगः) ऐश्वर्य होवे।
हे मनुष्यो ! (यः) जो (अवरः) नवीन (हिरण्यशृङ्गः) शृङ्ग के तुल्य जिस के तेज हैं, वह (इन्द्रः) उत्तम ऐश्वर्यवाला बिजुली के समान सभापति (आसीत्) होवे जो (प्रथमः) पहिला (अर्वन्तम्) घोड़े के तुल्य मार्ग को प्राप्त होते हुए अग्नि तथा (अयः) सुवर्ण का (अध्यतिष्ठत्) अधिष्ठाता अर्थात् अग्निप्रयुक्त यान पर बैठ के चलानेवाली होवे राजा (अस्य) इसके (पादाः) पग (मनोजवाः) मन के तुल्य वेगवाले हों अर्थात् पग का चलना काम विमानादि से लेवे (देवाः) विद्वान् सभासद् लोग (अस्य) इस राजा के (हविरद्यम्) देने और भोजन करने योग्य अन्न को (इत्, आयन्) ही प्राप्त होवें, उसको तुम लोग जानो ।
हे मनुष्यो ! (यत्) जो अग्नि आदि पदार्थों के तुल्य (ईर्मान्तासः) जिनका बैठने का स्थान प्रेरणा किया गया (सिलिकमध्यमासः) गदा आदि से लगा हुआ है मध्यप्रदेश जिनका ऐसे (शूरणासः) शीघ्र युद्ध में विजय के हेतु (दिव्यासः) उत्तम शिक्षित (अत्याः) निरन्तर चलनेवाले (अश्वाः) शीघ्रगामी घोड़े (श्रेणिशः) पङ्क्ति बाँधे हुए (हंसा इव) हंस पक्षियों के तुल्य (यतन्ते) प्रयत्न करते हैं और (दिव्यम्) शुद्ध (अज्मम्) मार्ग को (सम्, आक्षिषुः) व्याप्त होवें, उनको तुम लोग प्राप्त होओ।
हे (अर्वन्) घोड़े के तुल्य वर्त्तमान वीर पुरुष ! जिस (तव) तेरा (पतयिष्णु) नाशवान् (शरीरम्) शरीर (तव) तेरे (चित्तम्) अन्तःकरण की वृत्ति (वात इव) वायु के सदृश (ध्रजीमान्) वेगवाली अर्थात् शीघ्र दूरस्थ विषयों के तत्त्व जाननेवाली (तव) तेरे (पुरुत्रा) बहुत (अरण्येषु) जंगलों में (जर्भुराणा) शीघ्र धारण-पोषण करनेवाले (विष्ठिता) विशेषकर स्थित (शृङ्गाणि) शृङ्गों के तुल्य ऊँचे सेना के अवयव (चरन्ति) विचरते हैं सो तू धर्म का आचरण कर।
जो (दीध्यानः) सुन्दर प्रकाशमान हुआ (अजः) फेंकनेवाला (वाजी) वेगवान् (अर्वा) चालाक घोड़ा (देवद्रीचा) विद्वानों को प्राप्त होते हुए (मनसा) मन से (शसनम्) जिसमें हिंसा होती है, उस युद्ध को (उप, प्र, अगात्) अच्छे प्रकार समीप प्राप्त होता है। विद्वानों से (अस्य) इसका (नाभिः) मध्यभाग अर्थात् पीठ (पुरः) आगे (नीयते) प्राप्त की जाती अर्थात् उस पर बैठते हैं, उसको (पश्चात्) पीछे (रेभाः) सब विद्याओं की स्तुति करनेवाले (कवयः) बुद्धिमान् जन (अनु, यन्ति) अनुकूलता से प्राप्त होते हैं।
हे विद्वन् ! (यत्) जो (अर्वान्) ज्ञानी जन (जुष्टतमः) अतिशय कर सेवन किया हुआ (परमम्) उत्तम (सधस्थम्) साथियों के स्थान (पितरम्) पिता (मातरम्) माता (च) और (देवान्) विद्वानों की (अद्य) इस समय (आ, शास्ते) अधिक इच्छा करता है। (अथ) इसके अनन्तर (दाशुषे) दाता जन के लिए (वार्याणि) स्वीकार करने और भोजन के योग्य वस्तुओं को (उप, प्र, अगात्) प्रकर्ष करके समीप प्राप्त होता है, उसको (हि) ही आप (अच्छ) सम्यक् (गम्याः) प्राप्त हूजिये।
हे (जातवेदः) उत्तम बुद्धि को प्राप्त हुए (मित्रमहः) मित्रों का सत्कार करनेवाले विद्वन् ! जो (त्वम्) आप (अद्य) इस समय (समिद्धः) सम्यक् प्रकाशित अग्नि के तुल्य (मनुषः) मननशील (देवः) विद्वान् हुए (यजसि) सङ्ग करते हो (च) और (चिकित्वान्) विज्ञानवान् (दूतः) दुष्टों को दुःखदाई (प्रचेताः) उत्तम चेतनतावाला (कविः) सब विषयों में अव्याहतबुद्धि (असि) हो सो आप (दुरोणे) घर में (देवान्) विद्वानों वा उत्तम गुणों को (आ, वह) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये।
हे (सुजिह्व) सुन्दर जीभ वा वाणी से युक्त (तनूनपात्) विस्तृत पदार्थों को न गिरानेवाले विद्वान् जन ! आप (ऋतस्य) सत्य वा जल के (यानान्) जिनमें चलें उन (पथः) मार्गों को अग्नि के तुल्य (मध्वा) मधुरता अर्थात् कोमल भाव से (समञ्जन्) सम्यक् प्रकार करते हुए (स्वदय) स्वाद लीजिए अर्थात् प्रसन्न कीजिए (धीभिः) बुद्धियों वा कर्मों से (मन्मानि) यानों को (उत) और (नः) हमारे (अध्वरम्) नष्ट न करने और (यज्ञम्) सङ्गत करने योग्य व्यवहार को (ऋन्धन्) सम्यक् सिद्ध करता हुआ (च) भी (देवत्रा) विद्वानों में स्थित होकर (कृणुहि) कीजिए ।
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (ये) जो (सुक्रतवः) सुन्दर बुद्धियों और कर्मोंवाले (शुचयः) पवित्र (धियन्धाः) श्रेष्ठ धारणावती बुद्धि और कर्म को धारण करनेहारे (देवाः) विद्वान् लोग (उभयानि) दोनों शरीर और आत्मा को सुखकारी (हव्या) भोजन के योग्य पदार्थों को (स्वदन्ति) भोगते हैं। (एषाम्) इन विद्वानों के (यज्ञैः) सत्सङ्गादि रूप यज्ञों से (नराशंसस्य) मनुष्यों से प्रशंसित (यजतस्य) सङ्ग करने योग्य व्यवहार के (महिमानम्) बड़प्पन को (उप, स्तोषाम) समीप प्रशंसा करें, वैसे तुम लोग भी करो।
हे (यह्व) बड़े उत्तम गुणों से युक्त (अग्ने) अग्नि के तुल्य पवित्र विद्वन् ! जो (त्वम्) आप (देवानाम्) विद्वानों के बीच (होता) दानशील (यजीयान्) अति समागम करने हारे (असि) हैं, (इषितः) प्रेरणा किये हुए (एनान्) इन विद्वानों का (यक्षि) सङ्ग कीजिए (सः) सो आप (वसुभिः) निवास के हेतु विद्वानों के साथ (सजोषाः) समान प्रीति निबाहनेवाले (आजुह्वानः) अच्छे प्रकार स्पर्द्धा ईर्ष्या करते हुए (ईड्यः) प्रशंसा (च) तथा (वन्द्यः) नमस्कार के योग्य इन विद्वानों के निकट (आ) (याहि) आया कीजिए।
हे मनुष्यो ! जो (अस्याः) इस (पृथिव्याः) भूमि के बीच (प्राचीनम्) सनातन (बर्हिः) अन्तरिक्ष के तुल्य व्यापक ब्रह्म (वस्तोः) दिन के प्रकाश से (वृज्यते) अलग होता (अह्नाम्) दिनों के (अग्रे) आरम्भ प्रातःकाल में (देवेभ्यः) विद्वानों (उ) और (अदितये) अविनाशी आत्मा के लिए (वितरम्) विशेषकर दुःखों से पार करनेहारे (वरीयः) अतिश्रेष्ठ (स्योनम्) सुख को (वि, प्रथते) विशेषकर प्रकट करता उसको तुम लोग (प्रदिशा) वेद शास्त्र के निर्देश से जानो और प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! जैसे (उर्विया) अधिकता से शुभ गुणों में (व्यचस्वतीः) व्याप्तिवाली (बृहतीः) महती (विश्वमिन्वाः) सब व्यवहारों में व्याप्त (सुप्रायणाः) जिनके होने में उत्तम घर हों (देवीः) आभूषणादि से प्रकाशमान (द्वारः) दरवाजों के (न) समान अवकाशवाली (पतिभ्यः) पाणिग्रहण विवाह करनेवाले (देवेभ्यः) उत्तम गुणयुक्त पतियों के लिए (शुम्भमानाः) उत्तम शोभायमान हुई (जनयः) सब स्त्रियाँ अपने अपने पतियों को (वि, श्रयन्ताम्) विशेष कर सेवन करें, वैसे तुम लोग सब विद्याओं में व्यापक (भवत) होओ ।
हे विद्वन् ! यदि (दिव्ये) उत्तम गुण-कर्म-स्वभाववाली (योषणे) दो स्त्रियों के समान (सुरुक्मे) सुन्दर शोभायुक्त (बृहतीः) बड़ी (अधि) अधिक (श्रियम्) शोभा व लक्ष्मी को तथा (शुक्रपिशम्) प्रकाश और अन्धकाररूपों को (दधाने) धारण करती हुई (सुष्वयन्ती) सोती हुइयों के समान (उपाके) निकटवर्त्तिनी (उषासानक्ता) दिन-रात (योनौ) कालरूप कारण में (नि, आ, सदताम्) निरन्तर अच्छे प्रकार चलते हैं, उनको (यजते) सङ्गत करते तो अतुल शोभा को प्राप्त होओ ।
हे मनुष्यो ! जो (दैव्या) विद्वानों में कुशल (होतारा) दानशील (प्रथमा) प्रसिद्ध (सुवाचा) प्रशंसित वाणीवाले (मिमाना) विधान करते हुए (यज्ञम्) सङ्गतिरूप यज्ञ के (यजध्यै) करने को (मनुषः) मनुष्यों को (विदधेषु) विज्ञानों में (प्रचोदयन्ता) प्रेरणा करते हुए (प्रदिशा) वेदशास्त्र के प्रमाण से (प्राचीनम्) सनातन (ज्योतिः) शिल्पविद्या के प्रकाश का (दिशन्ता) उपदेश करते हुए (कारू) दो कारीगर लोग होवें, उनसे शिल्प विज्ञान शास्त्र पढ़ना चाहिए।
हे मनुष्यो ! जो (भारती) शिल्पविद्या को धारण करनेहारी क्रिया (इडा) सुन्दर शिक्षित मीठी वाणी (सरस्वती) विज्ञानवाली बुद्धि (इह) इस शिल्पविद्या के ग्रहणरूप व्यवहार में (नः) हमको (तूयम्) वर्धक (यज्ञम्) शिल्पविद्या के प्रकाशरूप यज्ञ को (मनुष्वत्) मनुष्य के तुल्य (चेतयन्ती) जनाती हुई हम को (आ, एतु) सब ओर से प्राप्त होवे, ये पूर्वोक्त (तिस्रः) तीन (देवी) प्रकाशमान (इदम्) इस (बर्हिः) बढ़े हुए (स्योनम्) सुखकारी काम को (स्वपसः) सुन्दर कर्मोंवाले हमको (आ, सदन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त करें ।
हे (होतः) ग्रहण करनेवाले जन ! (यः) जो (यजीयान्) अतिसमागम करनेवाला (इषितः) प्रेरणा किया हुआ (विद्वान्) सब ओर से विद्या को प्राप्त विद्वान् जैसे ईश्वर (इह) इस व्यवहार में (रूपैः) चित्र-विचित्र आकारों से (इमे) इन (जनित्री) अनेक कार्यों को उत्पन्न करनेवाली (द्यावापृथिवी) बिजुली और पृथिवी आदि (विश्वा) सब (भुवनानि) लोकों को (अपिंशत्) अवयवरूप करता है, वैसे (तम्) उस (त्वष्टारम्) वियोग-संयोग अर्थात् प्रलय उत्पत्ति करनेहारे (देवम्) ईश्वर का (अद्य) आज तू (यक्षि) सङ्ग करता है, इससे सत्कार करने योग्य है ।
हे विद्वन् पुरुष ! तू (देवानाम्) विद्वानों के (पाथः) भोगने योग्य अन्न आदि को (मधुना) मीठे कोमल आदि रसयुक्त (घृतेन) घी आदि से (समञ्जन्) सम्यक् मिलाते हुए (त्मन्या) अपने आत्मा से (हवींषि) लेने भोजन करने योग्य पदार्थों को (ऋतुथा) ऋतु-ऋतु में (उपावसृज) यथावत् दिया कर अर्थात् होम किया कर। उस तैने दिये (हव्यम्) भोजन के योग्य पदार्थ को (वनस्पतिः) किरणों का स्वामी सूर्य्य (शमिता) शान्तिकर्त्ता (देवः) उत्तम गुणोंवाला मेघ और (अग्निः) अग्नि (स्वदन्तु) प्राप्त होवें अर्थात् हवन किया पदार्थ उनको पहुँचे ।
हे मनुष्यो ! जो (सद्यः) शीघ्र (जातः) प्रसिद्ध हुआ (अग्निः) विद्या से प्रकाशित विद्वान् (होतुः) ग्रहण करनेहारे पुरुष के (ऋतस्य) सत्य का (प्रदिशि) जिससे निर्देश किया जाता है, उस (वाचि) वाणी में (यज्ञम्) अनेक प्रकार के व्यवहार को (वि, अमिमीत) विशेष कर निर्माण करता और (देवानाम्) विद्वानों में (पुरोगाः) अग्रगामी (अभवत्) होता है (अस्य) इसके (स्वाहाकृतम्) सत्य व्यवहार से सिद्ध किये वा होम किये से बचे (हविः) भोजन के योग्य अन्नादि को (देवाः) विद्वान् लोग (अदन्तु) खायें, उसको सर्वोपरि विराजमान मानो।
हे विद्वान् पुरुष ! जैसे (मर्याः) मनुष्य (अपेशसे) जिसके सुवर्ण नहीं है, उसके लिए (पेशः) सुवर्ण को और (अकेतवे) जिस को बुद्धि नहीं है, उसके लिए (केतुम्) बुद्धि को करते हैं, उन (उषद्भिः) होम करनेवाले यजमान पुरुषों के साथ बुद्धि और धन को (कृण्वन्) करते हुए आप (सम्, अजायथाः) सम्यक् प्रसिद्ध हूजिये। ।
(यत्) जो (वर्मी) कवचवाला योद्धा (अनाविद्धया) जिसमें कुछ भी घाव न लगा हो, उस (तन्वा) शरीर से (समदाम्) आनन्द के साथ जहाँ वर्त्ते, उन युद्धों के (उपस्थे) समीप में (प्रतीकम्) जिससे निश्चय करे, उस चिह्न को (याति) प्राप्त होता है, (सः) वह (जीमूतस्येव) मेघ के निकट जैसे बिजुली वैसे (भवति) होता है। हे विद्वन् ! जिस (त्वा) आप को (वर्मणः) रक्षा का (महिमा) महत्त्व (पिपर्त्तु) पाले सो (त्वम्) आप शत्रुओं को (जय) जीतिए।
हे वीर पुरुषो ! जैसे हम लोग जो (धनुः) शस्त्र-अस्त्र (शत्रोः) वैरी की (अपकामम्) कामनाओं को नष्ट (कृणोति) करता है, उस (धन्वना) धनुष् आदि शस्त्र-अस्त्र विशेष से (गाः) पृथिवियों को और (धन्वना) उक्त शस्त्र विशेष से (आजिम्) संग्राम को (जयेम) जीते (धन्वना) तोप आदि शस्त्र-अस्त्रों से (तीव्राः) तीव्र वेगवाली (समदः) आनन्द के साथ वर्त्तमान शत्रुओं की सेनाओं को (जयेम) जीतें (धन्वना) धनुष् से (सर्वाः) सब (प्रदिशः) दिशा प्रदिशाओं को (जयेम) जीतें, वैसे तुम लोग भी इस धनुष् आदि से जीतो।
हे वीर पुरुषो ! जो (इयम्) यह (वितता) विस्तारयुक्त (धन्वन्) धनुष में (अधि) ऊपर लगी (ज्या) प्रत्यञ्चा ताँत (वक्ष्यन्तीव) कहने को उद्यत हुई विदुषी स्त्री के तुल्य (इत्) ही (आगनीगन्ति) शीघ्र बोध को प्राप्त कराती हुई जैसे (कर्णम्) जिस की स्तुति सुनी जाती (प्रियम्) प्यारे (सखायम्) मित्र के तुल्य वर्त्तमान पति को (परिषस्वजाना) सब ओर से सङ्ग करती हुई (योषेव) स्त्री बोलती वैसे (शिङ्क्ते) शब्द करती है, (समने) संग्राम में (पारयन्ती) विजय को प्राप्त कराती हुई वर्त्तमान है, उसके बनाने बाँधने और चलाने को जानो।
हे वीर पुरुषो ! दो धनुष् की प्रत्यञ्चा (योषा) विदुषी (समनेव) प्राण के समान सम्यक् पति को प्यारी स्त्री स्वपति को और (मातेव) जैसे माता (पुत्रम्) अपने सन्तान को (बिभृताम्) धारण करें, वैसे (उपस्थे) समीप में (आचरन्ती) अच्छे प्रकार प्राप्त हुई (शत्रून्) शत्रुओं को (अप) (विध्यताम्) दूर तक ताड़ना करें (इमे) ये (संविदाने) अच्छे प्रकार विज्ञान की निमित्त (आर्त्नी) प्राप्त हुर्इं (अमित्रान्) शत्रुओं को (विष्फुरन्ती) विशेष कर चलायमान करती वर्त्तमान हैं, (ते) उन दोनों का यथावत् सम्यक् प्रयोग करो अर्थात् उन को काम में लाओ।
हे वीर पुरुषो ! जो (बह्वीनाम्) बहुत प्रत्यञ्चाओं का (पिता) पिता के तुल्य रखनेवाला (अस्य) इस पिता का (बहुः) बहुत गुणवाले (पुत्रः) पुत्र के समान सम्बन्धी (पृष्ठे) पिछले भाग में (निनद्धः) निश्चित बँधा हुआ (इषुधिः) बाण जिस में धारण किये जाते वह धनुष् (प्रसूतः) उत्पन्न हुआ (समना) संग्रामों को (अवगत्य) प्राप्त होके (चिश्चा) चिं चिं, चिं ऐसा शब्द (कृणोति) करता है (च) और जिससे वीर पुरुष (सर्वाः) सब (सङ्काः) इकट्ठी वा फैली हुई (पृतनाः) सेनाओं को (जयति) जीतता है, उसकी यथावत् रक्षा करो।
हे विद्वानो ! (सुषारथिः) सुन्दर सारथि घोड़ों वा अग्न्यादि को नियम में रखनेवाला (रथे) रमण करने योग्य पृथिवी जल वा आकाश में चलानेवाले यान में (तिष्ठन्) बैठा हुआ (यत्रयत्र) जिस-जिस संग्राम वा देश में (कामयते) चाहता है, वहाँ-वहाँ (वाजिनः) घोड़ों वा वेगवाले अग्न्यादि पदार्थों को (पुरः) आगे (नयति) चलाता है, जिन का (मनः) मन अच्छा शिक्षित (रश्मयः) लगाम की रस्सी वा किरण हस्तगत हैं (पश्चात्) पीछे से घोड़ों वा अग्न्यादि का (अनु, यच्छन्ति) अनुकूल निग्रह करते हैं, उन (अभीशूनाम्) सब ओर से शीघ्र चलनेहारों के (महिमानम्) महत्त्व की तुम लोग (पनायत) प्रशंसा करो।
हे वीर पुरुष ! जो (वृषपाणयः) जिनके बलवान् बैल आदि उत्तम प्राणी हाथों के समान रक्षा करनेवाले हैं (रथेभिः) रमण के योग्य यानों के (सह) साथ (वाजयन्तः) वीर आदि को शीघ्र चलाने हारे (प्रपदैः) उत्तम पगों की चालों से (अमित्रान्) मित्रतारहित दुष्टों को (अवक्रामन्तः) धमकाते हुए (अश्वाः) शीघ्र चलाने हारे घोड़े (तीव्रान्) तीखे (घोषान्) शब्दों को (कृण्वते) करते हैं और जो (अनपव्ययन्तः) व्यर्थ खर्च न कराते हुए योद्धा (शत्रून्) वैरियों को (क्षिणन्ति) क्षीण करते हैं, उन को तुम लोग प्राण के तुल्य पालो।
हे वीर पुरुषो ! (अस्य) इस योद्धा जन के (यत्र) जिस यान में (रथवाहनम्) जिस से विमानादि यान चलते वह (हविः) ग्रहण करने योग्य अग्नि, इन्धन, जल, काठ और धातु आदि सामग्री तथा (आयुधम्) बन्दूक, तोप, खड्ग, धनुष्, बाण, शक्ति और पद्म फाँसी आदि शस्त्र और (अस्य) इस योद्धा के (वर्म) कवच और (नाम) नाम (निहितम्) स्थित हैं (तत्र) उस यान में (सुमनस्यमानाः) सुन्दर विचार करते हुए (वयम्) हम लोग (शग्मम्) सुख तथा उस (रथम्) रमण योग्य यान को (विश्वाहा) सब दिन (उप, सदेम) निकट प्राप्त होवें।
हे युद्ध करने हारे वीर पुरुषो ! तुम लोग जो (स्वादुषंसदः) भोजन के योग्य अन्नादि पदार्थों को सम्यक् सेवनेवाले (वयोधाः) अधिक अवस्था युक्त (कृच्छ्रेश्रितः) उत्तम कार्यों की सिद्धि के लिए कष्ट सेवते हुए (शक्तीवन्तः) सामर्थ्यवाले (गभीराः) महाशय (चित्रसेनाः) आश्चर्य गुण युक्त सेनावाले (इषुबलाः) शस्त्र-अस्त्रों के सहित जिनकी सेना (अमृध्राः) दृढ़ शरीरवाले (उरवः) बड़े-बड़े जिन के जङ्घा और छाती (व्रातसाहाः) वीरों के समूहों को सहनेवाले (सतोवीराः) विद्यमान सेना के बीच युद्धविद्या की शिक्षा को प्राप्त और (पितरः) पालन करनेहारे राजपुरुष हों, उन का आश्रय ले युद्ध करो।
हे मनुष्यो ! जो (सोम्यासः) उत्तम आनन्दकारक गुणों के योग्य (ऋतावृधः) सत्य को बढ़ानेवाले (पितरः) रक्षक (ब्राह्मणासः) वेद और ईश्वर के जानने हारे विद्वान् जन (नः) हमारे लिए कल्याण करने हारे और (अनेहसा) कारणरूप से अविनाशी (द्यावापृथिवी) प्रकाश-पृथिवी (शिवे) कल्याणकारी हों, (पूषा) पुष्टि करने हारा परमात्मा (नः) हम को (दुरितात्) दुष्ट अन्याय के आचरण से (पातु) बचावे, जिससे (नः) हम को मारने को (अघशंसः) पाप की प्रशंसा करने हारा चोर (माकिः) न (ईशत) समर्थ हो, उन विद्वानों की तू (रक्ष) रक्षा कर और चोरों को मार।
हे वीर पुरुषो ! (यत्र) जिस सेना में (नरः) नायक लोग हों जो (सुपर्णम्) सुन्दर पूर्ण रक्षा के साधन उस रथादि को (वस्ते) धारण करती और जहाँ (गोभिः) गौओं के सहित (दन्तः) जिस का दमन किया जाता, उस (मृगः) कस्तूरी से शुद्ध करनेवाले मृग के तुल्य (इषवः) बाण आदि शस्त्र विशेष चलते हैं, जो (सन्नद्धा) सम्यक् गोष्ठी बँधी (प्रसूता) प्रेरणा की हुई शत्रुओं में (पतति) गिरती (च) और इधर-उधर (अस्याः) इस सेना के वीर पुरुष (सम्, द्रवन्ति) सम्यक् चलते (च) और (वि) विशेषकर दौड़ते हैं (तत्र) उस सेवा में (अस्मभ्यम्) हमारे लिए आप लोग (शर्म) सुख (यंसन्) देओ।
हे विद्वन् पुरुष ! आप (ऋजीते) सरल व्यवहार में (नः) हमारे शरीर से रोगों को (परि, वृङ्धि) सब ओर से पृथक् कीजिए, जिससे (नः) हमारा (तनूः) शरीर (अश्मा) पत्थर के तुल्य दृढ़ (भवतु) हो, जो (सोमः) उत्तम औषधि है, उस और जो (अदितिः) पृथिवी है, उन दोनों का आप (अधि, ब्रवीतु) अधिकार उपदेश कीजिए और (नः) हमारे लिए (शर्म) सुख वा घर (यच्छतु) दीजिए।
हे (अश्वाजनि) घोड़ों को शिक्षा देनेवाली विदुषि राणी ! जैसे वीर पुरुष (एषाम्) इन घोड़े आदि के (सानु) अवयव को (आ, जङ्घन्ति) अच्छे प्रकार शीघ्र ताड़ना करते हैं (जघनान्) ज्वानों को (उप जिघ्नते) समीप से चलाते हैं, वैसे तू (समत्सु) संग्रामों में (प्रचेतसः) शिक्षा से विशेष कर चेतन किये (अश्वान्) घोड़ों को (चोदय) प्रेरणा कर।
हे मनुष्य ! जो (हस्तघ्नः) हाथों से मारनेवाले (विद्वान्) विद्वान् (पुमान्) पुरुषार्थी आप (ज्यायाः) प्रत्यञ्चा से (हेतिम्) बाण को चला के (बाहुम्) बाधा देनेवाले शत्रु को (परिबाधमानः) सब ओर से निवृत्त करते हुए (पुमांसम्) पुरुषार्थी जन की (विश्वतः) सब प्रकार से (परि, पातु) चारों ओर से रक्षा कीजिए सो (अहिरिव) मेघ के तुल्य गर्जते हुए आप (भोगैः) उत्तम भोगों के सहित (विश्वा) सब (वयुनानि) विज्ञानों को (परि, एति) सब ओर से प्राप्त होते हो ।
हे (वनस्पते) किरणों के रक्षक सूर्य के समान वन आदि के रक्षक विद्वन् राजन् ! आप (अस्मत्सखा) हमारे रक्षक मित्र (प्रतरणः) शत्रुओं के बल का उल्लङ्घन करने हारे (सुवीरः) सुन्दर वीर पुरुषों से युक्त (वीड्वङ्गः) प्रशंसित अवयववाले (हि) निश्चय कर (भूयाः) हूजिये, जिस कारण आप (गोभिः) पृथिवी आदि के साथ (सन्नद्धः) सम्बन्ध रखने को तत्पर (असि) हैं, इसलिए हम को (वीडयस्व) दृढ़ कीजिए (ते) आप का (आस्थाता) युद्ध में अच्छे-अच्छे प्रकार स्थिर रहनेवाला वीर सेनापति (जेत्वानि) जीतने योग्य शत्रुओं को (जयतु) जीते।
हे विद्वन् ! आप (दिवः) सूर्य और (पृथिव्याः) पृथिवी से (उद्भृतम्) उत्कृष्टता से धारण किये (ओजः) पराक्रम को (परि, यज) सब ओर से दीजिए (वनस्पतिभ्यः) वट आदि वनस्पतियों से (आभृतम्) अच्छे प्रकार पुष्ट किये (सहः) बल को (परि) सब ओर से दीजिए (अपाम्) जलों के सम्बन्ध से (ओज्मानम्) पराक्रमवाले रस को (परि) चारों ओर से दीजिए तथा (इन्द्रस्य) सूर्य को (गोभिः) किरणों से (आवृतम्) युक्त चिलकते हुए (वज्रम्) वज्र के तुल्य (रथम्) यान को (हविषा) ग्रहण से सङ्गत कीजिए ।
हे (देव) उत्तम विद्यावाले (रथ) रमणीयस्वरूप विद्वन् ! (इमाम्) इस (हव्यदातिम्) देने योग्य पदार्थों के दान को (जुषाणः) सेवते हुए (सः) पूर्वोक्त आप जो (इन्द्रस्य) बिजुली का (वज्रः) गिरना (मरुताम्) मनुष्यों की (अनीकम्) सेना (मित्रस्य) मित्र के (गर्भः) अन्तःकरण का आशय और (वरुणस्य) श्रेष्ठ जन के (नाभिः) आत्मा का मध्यवर्त्ती विचार है, उसको (नः) और हमको (हव्या) ग्रहण करने योग्य वस्तुओं को (प्रति गृभाय) प्रतिग्रह अर्थात् स्वीकार कीजिए ।
हे (दुन्दुभे) नगाड़े के तुल्य गरजने हारे ! (सः) सो आप (इन्द्रेण) ऐश्वर्य से युक्त (देवैः) उत्तम विद्वान् वा गुणों के साथ (सजूः) संयुक्त (दूरात्) दूर से भी (दवीयः) अतिदूर (शत्रून्) शत्रुओं को (अपसेध) पृथक् कीजिए (पुरुत्रा) बहुत विध (पृथिवीम्) आकाश (उत) और (द्याम्) बिजुली के प्रकाश को (उप, श्वासय) निकट जीवन धारण कराइये, आप उन अन्तरिक्ष और बिजुली से (विष्ठितम्) व्याप्त (जगत्) संसार को (मनुताम्) मानो उस (ते) आपका राज्य आनन्दित होवे ।
हे (दुन्दुभे) नगाड़ों के तुल्य जिनकी सेना गर्जती ऐसे सेनापते ! (दुरिता) दुष्ट व्यसनों को (बाधमानः) निवृत्त करते हुए आप (नः) हमारे लिए (बलम्) बल को (आ, क्रन्दय) पहुँचाइये (ओजः) पराक्रम को (आ, धाः) अच्छे प्रकार धारण कीजिए, सेना को (निष्टनिहि) विस्तृत कीजिए, जो (दुच्छुनाः) दुष्ट कुत्तों के तुल्य वर्त्तमान हैं, उनको (अप) बुरे प्रकार रुलाइये जिस कारण आप (मुष्टिः) मूठों के तुल्य प्रबन्धकर्त्ता (असि) हैं, इससे (इतः) इस सेना से (इन्द्रस्य) बिजुली के अवयवों को (वीडयस्व) दृढ़ कीजिए और सुखों को (प्रोथ) पूरण कीजिए।
हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्ययुक्त राजपुरुष ! आप (अमूः) उन शत्रुसेनाओं को (आ अज) अच्छे प्रकार दूर फेंकिये (केतुमत्) ध्वजावाली (इमाः) इन अपनी सेनाओं को (प्रति, आवर्त्तय) लौटा लावो, जैसे (दुन्दुभिः) नगाड़ा (वावदीति) अत्यन्त बजता है, वैसे (नः) हमको (अश्वपर्णाः) घोड़ों का जिनमें पालन हो, वे सेना (सम्, चरन्ति) सम्यक् विचरती हैं, जो (अस्माकम्) हमारे (रथिनः) प्रशंसित रथों पर चढ़े हुए वीर (नरः) नायक जन शत्रुओं को (जयन्तु) जीतें, वे सत्कार को प्राप्त हों।
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो (आग्नेयः) अग्नि देवतावाला अर्थात् अग्नि के उत्तम गुणों से युक्त है, वह (कृष्णग्रीवः) काले गलेवाला पशु, जो (सारस्वती) सरस्वती वाणी के गुणोंवाली, वह (मेषी) भेड़, जो (सौम्यः) चन्द्रमा के गुणोंवाला, वह (बभ्रुः) धुमेला पशु, जो (पौष्णः) पुष्टि आदि गुणोंवाला वह (श्यामः) श्याम रङ्ग से युक्त पशु, जो (बार्हस्पत्यः) बड़े आकाशादि के पालन आदि गुणयुक्त, वह (शितिपृष्ठः) काली पीठवाला पशु, जो (वैश्वदेवः) सब विद्वानों के गुणोंवाला, वह (शिल्पः) अनेक वर्णयुक्त, जो (ऐन्द्रः) सूर्य्य के गुणोंवाला, वह (अरुणः) लाल रङ्गयुक्त, जो (मारुतः) वायु के गुणोंवाला, वह (कल्माषः) खाखी रङ्ग युक्त, जो (ऐन्द्राग्नः) सूर्य्य-अग्नि के गुणोंवाला, वह (संहितः) मोटे दृढ़ अङ्गयुक्त, जो (सावित्रः) सूर्य के गुणों से युक्त, वह (अधोरामः) नीचे विचरनेवाला पक्षी, जो (एकशितिपात्) जिसका एक पग काला (पेत्वः) उड़नेवाला और (कृष्णः) काले रङ्ग से युक्त, वह (वारुणः) जल के शान्त्यादि गुणोंवाला है, इस प्रकार इन सब को जानो।
हे मनुष्यो ! तुम लोग (अनीकवते) प्रशंसित सेनावाले (अग्नये) विज्ञान आदि गुणों के प्रकाशक सेनापति के लिए (रोहिताञ्जिः) लाल चिह्नोंवाला (अनड्वान्) बैल (सावित्रौ) सूर्य के गुणवाले (अधोरामौ) नीचे भाग में श्वेतवर्णवाले (पौष्णौ) पुष्टि आदि गुणयुक्त (रजतनाभी) चाँदी के वर्ण के तुल्य जिनकी नाभि (वैश्वदेवौ) सब विद्वानों के सम्बन्धी (तूपरौ) मुण्डे (पिशङ्गौ) पीले दो पशु (मारुतः) वायु देवतावाला (कल्माषः) खाखी रङ्गयुक्त (आग्नेयः) अग्नि देवतावाला (कृष्णः, अजः) काला बकरा (सारस्वती) वाणी के गुणोंवाली (मेषी) भेड़ और (वारुणः) जल के गुणोंवाला (पेत्वः) शीघ्रगामी पशु है, उन सब को गुणों के अनुकूल काम में लाओ।
हे मनुष्यो ! तुम लोगों को चाहिए कि (त्रिवृते) सत्त्व, रज और तमोगुण इन तीन गुणों से युक्त (राथन्तराय) रथों अर्थात् जलयानों से समुद्रादि को तरनेवाले (गायत्राय) गायत्री छन्द से जताये हुए (अग्नये) अग्नि के अर्थ (अष्टाकपालः) आठ खपरों में संस्कार किया (पञ्चदशाय) पन्द्रहवें प्रकार के (त्रैष्टुभाय) त्रिष्टुप् छन्द से प्रख्यात (बार्हताय) बड़ों के साथ सम्बन्ध रखनेवाले (इन्द्राय) ऐश्वर्य के लिए (एकादशकपालः) ग्यारह खपरों में संस्कार किया पाक (विश्वेभ्यः) सब (जागतेभ्यः) जगती छन्द से जताये हुए (सप्तदशेभ्यः) सत्रहवें (वैरूपेभ्यः) विविध रूपोंवाले (देवेभ्यः) दिव्य गुणयुक्त मनुष्यों के लिए (द्वादशकपालः) बारह खपरों में संस्कार किया पाक (आनुष्टुभाभ्याम्) अनुष्टुप् छन्द से प्रकाशित हुए (एकविंशाभ्याम्) इक्कीसवें (वैराजाभ्याम्) विराट् छन्द से जताये हुए (मित्रावरुणाभ्याम्) प्राण और उदान के अर्थ (पयस्या) जलक्रिया में कुशल विद्वान् (बृहस्पतये) बड़ों के रक्षक (पाङ्क्ताय) पान्तों में श्रेष्ठ (त्रिणवाय) कर्म, उपासना और ज्ञानों से स्तुति किये (शाक्वराय) शक्ति से प्रगट हुए के लिए (चरुः) पाकविशेष (औष्णिहाय) उष्णिक् छन्द से जताये हुए (त्रयस्त्रिंशाय) तेंतीसवें (रैवताय) धन के सम्बन्धी (सवित्रे) ऐश्वर्य उत्पन्न करने हारे के लिए (द्वादशकपालः) बारह खपरों में संस्कार किया (प्राजापत्यः) प्रजापति देवतावाला (चरुः) बटलोई में पका अन्न (अदित्यै) अखिण्डत (विष्णुपत्न्यै) विष्णु व्यापक ईश्वर से रक्षित अन्तरिक्ष रूप के लिए (चरुः) पाक (वैश्वानराय) सब मनुष्यों में प्रकाशमान (अग्नये) बिजुलीरूप अग्नि के लिए (द्वादशकपालः) बारह खपरों में पका हुआ और (अनुमत्यै) पीछे माननेवाले के लिए (अष्टाकपालः) आठ खपरों में सिद्ध किया पाक बनाना चाहिए।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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