हे मनुष्यो ! जैसे (उर्विया) अधिकता से शुभ गुणों में (व्यचस्वतीः) व्याप्तिवाली (बृहतीः) महती (विश्वमिन्वाः) सब व्यवहारों में व्याप्त (सुप्रायणाः) जिनके होने में उत्तम घर हों (देवीः) आभूषणादि से प्रकाशमान (द्वारः) दरवाजों के (न) समान अवकाशवाली (पतिभ्यः) पाणिग्रहण विवाह करनेवाले (देवेभ्यः) उत्तम गुणयुक्त पतियों के लिए (शुम्भमानाः) उत्तम शोभायमान हुई (जनयः) सब स्त्रियाँ अपने अपने पतियों को (वि, श्रयन्ताम्) विशेष कर सेवन करें, वैसे तुम लोग सब विद्याओं में व्यापक (भवत) होओ ।
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