अध्याय 1 — अध्याय 1
यजुर्वेद
31 श्लोक • केवल अनुवाद
हे मनुष्य लोगो ! जो (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाला सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त (देवः) सब सुखों के देने और सब विद्या के प्रसिद्ध करनेवाला परमात्मा है, सो (वः) तुम हम और अपने मित्रों के जो (वायवः) सब क्रियाओं के सिद्ध करानेहारे स्पर्श गुणवाले प्राण अन्तःकरण और इन्द्रियाँ (स्थ) हैं, उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्युत्तम (कर्मणे) करने योग्य सर्वोपकारक यज्ञादि कर्मों के लिये (प्रार्पयतु) अच्छी प्रकार संयुक्त करे। हम लोग (इषे) अन्न आदि उत्तम-उत्तम पदार्थों और विज्ञान की इच्छा और (ऊर्जे) पराक्रम अर्थात् उत्तम रस की प्राप्ति के लिये (भागम्) सेवा करने योग्य धन और ज्ञान के भरे हुए (त्वा) उक्त गुणवाले और (त्वा) श्रेष्ठ पराक्रमादि गुणों के देने हारे आपका सब प्रकार से आश्रय करते हैं। हे मित्र लोगो ! तुम भी ऐसे होकर (आप्यायध्वम्) उन्नति को प्राप्त हो तथा हम भी हों। हे भगवन् जगदीश्वर ! हम लोगों के (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये (प्रजावतीः) जिनके बहुत सन्तान हैं तथा जो (अनमीवाः) व्याधि और (अयक्ष्माः) जिनमें राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं हैं, वे (अघ्न्याः) जो-जो गौ आदि पशु वा उन्नति करने योग्य हैं, जो कभी हिंसा करने योग्य नहीं, जो इन्द्रियाँ वा पृथिवी आदि लोक हैं, उन को सदैव (प्रार्पयतु) नियत कीजिये। हे जगदीश्वर ! आपकी कृपा से हम लोगों में से दुःख देने के लिये कोई (अघशंसः) पापी वा (स्तेनः) चोर डाकू (मा ईशत) मत उत्पन्न हो तथा आप इस (यजमानस्य) परमेश्वर और सर्वोपकार धर्म के सेवन करनेवाले मनुष्य के (पशून्) गौ, घोड़े और हाथी आदि तथा लक्ष्मी और प्रजा की (पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये, जिससे इन पदार्थों के हरने को पूर्वोक्त कोई दुष्ट मनुष्य समर्थ (मा) न हो, (अस्मिन्) इस धार्मिक (गोपतौ) पृथिवी आदि पदार्थों की रक्षा चाहनेवाले सज्जन मनुष्य के समीप (बह्वीः) बहुत से उक्त पदार्थ (ध्रुवाः) निश्चल सुख के हेतु (स्यात) हों। इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ-ब्राह्मण में की है, उसका ठिकाना पूर्व संस्कृत-भाष्य में लिख दिया और आगे भी ऐसा ही ठिकाना लिखा जायगा, जिसको देखना हो, वह उस ठिकाने से देख लेवे
हे परमेश्वर ! आप (धूः) सब दोषों के नाश और जगत् की रक्षा करनेवाले (असि) हैं, इस कारण हम लोग इस बुद्धि से (देवानाम्) विद्वानों को विद्या मोक्ष और सुख में (वह्नितमम्) यथायोग्य पहुँचाने (सस्नितमम्) अतिशय कर के शुद्ध करने (पप्रितमम्) सब विद्या और आनन्द से संसार को पूर्ण करने (जुष्टतमम्) धार्मिक भक्तजनों के सेवा करने योग्य और (देवहूतमम्) विद्वानों की स्तुति करने योग्य आप की नित्य उपासना करते हैं। (यः) जो कोई द्वेषी, छली, कपटी, पापी, कामक्रोधादियुक्त मनुष्य (अस्मान्) धर्मात्मा और सब को सुख से युक्त करनेवाले हम लोगों को (धूर्वति) दुःख देता है और (यम्) जिस पापीजन को (वयम्) हम लोग (धूर्वामः) दुःख देते हैं, (तम्) उसको आप (धूर्व) शिक्षा कीजिये तथा जो सबसे द्रोह करने वा सबको दुःख देता है, उसको भी आप सदैव (धूर्व) ताड़ना कीजिये ॥८॥ हे शिल्पविद्या को जानने की इच्छा करनेवाले मनुष्य ! तू जो भौतिक अग्नि (धूः) सब पदार्थों का छेदन और अन्धकार का नाश करनेवाला (असि) है तथा जो कला चलाने की चतुराई से यानों में विद्वानों को (वह्नितमम्) सुख पहुँचाने (सस्नितमम्) शुद्धि होने का हेतु (पप्रितमम्) शिल्पविद्या का मुख्य साधन (जुष्टतमम्) कारीगर लोग जिस का सेवन करते हैं तथा जो (देवहूतमम्) विद्वानों को स्तुति करने योग्य अग्नि है, उस को (वयम्) हम लोग (धूर्वामः) ताड़ते हैं और जिसका सेवन युक्ति से न किया जाय तो (अस्मान्) हम लोगों को (धूर्वति) पीड़ा करता है, (तम्) उस (धूर्वन्तम्) पीड़ा करनेवाले अग्नि को (धूर्व) यानादिकों में युक्त कर तथा हे वीर पुरुष ! तुम (यः) जो दुष्ट शत्रु (अस्मान्) हम लोगों को (धूर्वति) दुःख देता है (तम्) उस को (धूर्व) नष्ट कर तथा जो कोई चोर आदि है, उसका भी (धूर्व) नाश कीजिये
यह जैसे (इन्द्रः) सूर्य्यलोक (वृत्रतूर्य्ये) मेघ के वध के लिये (युष्माः) पूर्वोक्त जलों को (अवृणीत) स्वीकार करता है, जैसे जल (इन्द्रम्) वायु को (अवृणीध्वम्) स्वीकार करते हैं, वैसे ही (यूयम्) हे मनुष्यो ! तुम लोग उन जल, औषधि, रसों को शुद्ध करने के लिये (वृत्रतूर्य्ये) मेघ के शीघ्रवेग में (प्रोक्षिताः) संसारी पदार्थों के सींचनेवाले जलों को (अवृणीध्वम्) स्वीकार करो और जैसे वे जल शुद्ध (स्थ) होते हैं, वैसे तुम भी शुद्ध हो। इसलिये मैं यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाला (दैव्याय) सब को शुद्ध करनेवाले (कर्मणे) उत्क्षेपण=उछालना, अवक्षेपण=नीचे फेंकना, आकुञ्चन=सिमेटना, प्रसारण=फैलाना, गमन=चलना आदि पाँच प्रकार के कर्म हैं, उन के और (देवयज्यायै) विद्वान् वा श्रेष्ठ गुणों की दिव्य क्रिया के लिये तथा (अग्नये) भौतिक अग्नि से सुख के लिये (जुष्टम्) अच्छी क्रियाओं से सेवन करने योग्य (त्वा) उस यज्ञ को (प्रोक्षामि) करता हूँ तथा (अग्नीषोमाभ्याम्) अग्नि और सोम से वर्षा के निमित्त (जुष्टम्) प्रीति देनेवाला और प्रीति से सेवने योग्य (त्वा) उक्त यज्ञ को (प्रोक्षामि) मेघमण्डल में पहुँचाता हूँ। इस प्रकार यज्ञ से शुद्ध किये हुए जल (शुन्धध्वम्) अच्छे प्रकार शुद्ध होते हैं। (यत्) जिस कारण यज्ञ की शुद्धि से (वः) पूर्वोक्त जलों के अशुद्धि आदि दोष (पराजघ्नुः) निवृत्त हों, (तत्) उन जलों की शुद्धि को मैं (शुन्धामि) अच्छे प्रकार शुद्ध करता हूँ ॥ यह इस मन्त्र का प्रथम अर्थ है ॥१॥१३॥ हे यज्ञ करनेवाले मनुष्यो ! (यत्) जिस कारण (इन्द्रः) सूर्य्यलोक (वृत्रतूर्य्ये) मेघ के वध के निमित्त (युष्माः) पूर्वोक्त जल और (इन्द्रम्) पवन को (अवृणीत) स्वीकार करता है तथा जिस कारण सूर्य्य ने (वृत्रतूर्य्ये) मेघ की शीघ्रता के निमित्त (युष्माः) पूर्वोक्त जलों को (प्रोक्षिताः) पदार्थ सींचनेवाले (स्थ) किये हैं, इससे (यूयम्) तुम (त्वा) उक्त यज्ञ को सदा स्वीकार करके (नयत) सिद्धि को प्राप्त करो। इस प्रकार हम सब लोग (दैव्याय) श्रेष्ठ कर्म वा (देवयज्यायै) विद्वान् और दिव्य गुणों की श्रेष्ठ क्रियाओं के तथा (अग्नये) परमेश्वर की प्राप्ति के लिये (जुष्टम्) प्रीति करानेवाले यज्ञ को (प्रोक्षामि) सेवन करें तथा (अग्नीषोमाभ्याम्) अग्नि और सोम से प्रकाशित होनेवाले (त्वा) उक्त यज्ञ को (प्रोक्षामि) मेघमण्डल में पहुँचावें। हे मनुष्यो ! इस प्रकार करते हुए तुम सब पदार्थों वा सब मनुष्यों को (शुन्धध्वम्) शुद्ध करो और (यत्) जिससे (वः) तुम लोगों के अशुद्धि आदि दोष हैं, वे सदा (पराजघ्नुः) निवृत्त होते रहें। वैसे ही मैं वेद का प्रकाश करनेवाला तुम लोगों के शोधन अर्थात् शुद्धिप्रकार को (शुन्धामि) अच्छे प्रकार बढ़ाता हूँ
जिस कारण यह यज्ञ (मधुजिह्वः) जिस में मधुर गुणयुक्त वाणी हो तथा (कुक्कुटः) चोर वा शत्रुओं का विनाश करनेवाला (असि) है और (इषम्) अन्न आदि पदार्थ वा (ऊर्जम्) विद्या आदि बल और उत्तम से उत्तम रस को देता है, इसी से उसका अनुष्ठान सदा करना चाहिये। हे विद्वान् लोगो ! तुम उक्त गुणों को देनेवाला जो तीन प्रकार का यज्ञ है, उसके अनुष्ठान और गुण के ज्ञाता (असि) हो, अतः हम लोगों को भी उसके गुणों का (आवद) उपदेश करो, जिससे (वयम्) हम लोग (त्वया) तुम्हारे साथ (संघातं संघातम्) जिनमें उत्तम रीति से शत्रुओं का पराजय होता है अर्थात् अति भारी संग्रामों को वारम्वार (आ जेष्म) सब प्रकार से जीतें, क्योंकि आप युद्धविद्या के जाननेवाले (असि) हैं, इसी से सब मनुष्य (वर्षवृद्धम्) शस्त्र और अस्त्रविद्या की वर्षा को बढ़ानेवाले (त्वा) आप तथा (वर्षवृद्धम्) वृष्टि के बढ़ानेवाले उक्त यज्ञ को (प्रतिवेत्तु) जानें। इस प्रकार संग्राम करके सब मनुष्यों को (परापूतम्) पवित्रता आदि गुणों को छोड़नेवाले (रक्षः) दुष्ट मनुष्य तथा (परापूताः) शुद्धि को छोड़नेवाले और (अरातयः) दान आदि धर्म से रहित शत्रुजन तथा (रक्षः) डाकुओं का जैसे (अपहतम्) नाश हो सके, वैसा प्रयत्न सदा करना चाहिये। जैसे यह (हिरण्यपाणिः) जिसका ज्योति हाथ है, ऐसा जो (वायुः) पवन है, वह (अच्छिद्रेण) एकरस (पाणिना) अपने गमनागमन व्यवहार से यज्ञ और संसार में अग्नि और सूर्य्य से अति सूक्ष्म हुए पदार्थों को (प्रतिगृभ्णातु) ग्रहण करता है। वा (हिरण्यपाणिः) जैसे किरण हैं हाथ जिस के वह (हिरण्यपाणिः) किरण व्यवहार से (सविता) वृष्टि वा प्रकाश के द्वारा दिव्य गुणों के उत्पन्न करने में हेतु (देवः) प्रकाशमय सूर्य्यलोक (वः) उन पदार्थों को (विविनक्तु) अलग-अलग अर्थात् परमाणुरूप करता है, वैसे ही परमेश्वर वा विद्वान् पुरुष (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पाणिना) अपने उपदेशरूप व्यवहार से सब विद्याओं को (विविनक्तु) प्रकाश करें, वैसे ही कृपा करके प्रीति के साथ (वः) तुमको अत्यन्त आनन्द करने के लिये (प्रतिगृभ्णातु) ग्रहण करते हैं
हे (अग्ने) परमेश्वर ! आप (धरुणम्) सब के धारण करनेवाले (असि) हैं, इससे मेरी (ब्रह्म) वेद मन्त्रों से की हुई स्तुति को (गृभ्णीष्व) ग्रहण कीजिये तथा (अन्तरिक्षम्) आत्मा में स्थित जो अक्षय ज्ञान है, उसको (दृंह) बढ़ाइये। मैं (भ्रातृव्यस्य) शत्रुओं के (वधाय) विनाश के लिये (ब्रह्मवनि) सब मनुष्यों के सुख के निमित्त वेद के शाखा-शाखान्तर द्वारा विभाग करनेवाले ब्राह्मण तथा (क्षत्रवनि) राजधर्म के प्रकाश करनेहारे (सजातवनि) जो परस्पर समान क्षत्रियों के धर्म और संसारी मूर्तिमान् पदार्थ हैं, इनका प्राणियों के लिये अलग-अलग प्रकाश करनेवाले (त्वा) आपको (उपदधामि) हृदय के बीच में धारण करता हूँ। हे सब के धारण करनेवाले परमेश्वर ! जो आप (धर्त्रम्) लोकों के धारण करनेवाले [असि] हैं, इससे कृपा करके हम लोगों में (दिवम्) अत्युत्तम ज्ञान को (दृंह) बढ़ाइये और मैं (भ्रातृव्यस्य) शत्रुओं के (वधाय) विनाश के लिये (ब्रह्मवनि) (क्षत्रवनि) (सजातवनि) उक्त वेद राज्य वा परस्पर समान विद्या वा राज्यादि व्यवहारों को यथायोग्य विभाग करनेवाले (त्वा) आपको (उपदधामि) वारंवार अपने हृदय में धारण करता हूँ। तथा मैं (त्वा) आपको सर्वव्यापक जानकर (विश्वाभ्यः) सब (आशाभ्यः) दिशाओं से सुख होने के निमित्त वारंवार (उपदधामि) अपने मन में धारण करता हूँ। हे मनुष्यो ! तुम लोग उक्त व्यवहार को अच्छी प्रकार जानकर (चितः) विज्ञानी (ऊर्ध्वचितः) उत्तम ज्ञानवाले पुरुषों की प्रेरणा से कपालों को अग्नि पर धरके तथा (भृगूणाम्) जिनसे विद्या आदि गुणों को प्राप्त होते हैं, ऐसे (अङ्गिरसाम्) प्राणों के (तपसा) प्रभाव से (तप्यध्वम्) तपो और तपाओ ॥ यह इस मन्त्र का प्रथम अर्थ हुआ ॥ अब दूसरा भी कहते हैं ॥ हे विद्वान् धर्मात्मा पुरुष ! जिस (अग्ने) भौतिक अग्नि से (धरुणम्) सब का धारण करनेवाला तेज (ब्रह्म) वेद और (अन्तरिक्षम्) आकाश में रहनेवाले पदार्थ ग्रहण वा वृद्धियुक्त किये जाते हैं, (त्वा) उसको तुम होम वा शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये (गृभ्णीष्व) ग्रहण करो (दृंह) वा विद्यायुक्त क्रियाओं से बढ़ाओ और मैं भी (भ्रातृव्यस्य) शत्रुओं के (वधाय) विनाश के लिये (त्वा) उस (ब्रह्मवनि) (क्षत्रवनि) (सजातवनि) संसारी मूर्तिमान् पदार्थों के प्रकाश करने वा राजगुणों के दृष्टान्तरूप से प्रकाश करानेवाले भौतिक अग्नि को शिल्पविद्या आदि व्यवहारों में (उपदधामि) स्थापन करता हूँ। ऐसे स्थापन किया हुआ अग्नि हमारे अनेक सुखों को धारण करता है। इसी प्रकार सब लोगों का (धर्त्रम्) धारण करनेवाला वायु (असि) है तथा (दिवम्) प्रकाशमय सूर्य्यलोक को (दृंह) दृढ़ करता है। हे मनुष्यो ! जैसे उसको मैं (भ्रातृव्यस्य) अपने शत्रुओं के (वधाय) विनाश के लिये (ब्रह्मवनि) (क्षत्रवनि) (सजातवनि) वेद राज्य वा परस्पर समान उत्तम-उत्तम शिल्पविद्याओं को यथायोग्य कार्य्यों में युक्त करनेवाले उस भौतिक अग्नि को (उपदधामि) स्थापन करता हूँ, वैसे तुम भी उत्तम-उत्तम क्रियाओं में युक्त करके विद्या के बल से (दृंह) उसको बढ़ाओ। हे विद्या चाहनेवाले पुरुष ! जो पवन, पृथिवी और सूर्य्य आदि लोकों को धारण कर रहा है उसे तुम अपने जीवन आदि सुख वा शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये यथायोग्य कार्यों में लगाकर उसकी विद्या से (दृंह) वृद्धि करो तथा जैसे हम अपने शत्रुओं के विनाश के लिये (ब्रह्मवनि) (क्षत्रवनि) (सजातवनि) अग्नि के उक्त गुणों के समान वायु को शिल्पविद्या आदि व्यवहारों में (उपदधामि) संयुक्त करते हैं, वैसे ही तुम भी अपने अनेक दुःखों के विनाश के लिये उसको यथायोग्य कार्य्यों में संयुक्त करो। हे मनुष्यो ! जैसे मैं वायुविद्या का जाननेवाला (त्वा) उस अग्नि वा वायु को (विश्वाभ्यः) सब (आशाभ्यः) दिशाओं से सुख होने के लिये यथायोग्य शिल्पव्यवहारों में (उपदधामि) धारण करता हूँ, वैसे तुम भी धारण करो तथा शिल्पविद्या वा होम करने के लिये (चितः) (ऊर्ध्वचितः) [स्थ] पदार्थों के भरे हुए पात्र वा सवारियों में स्थापन किये हुए कलायन्त्रों को (भृगूणाम्) जिनसे पदार्थों को पकाते हैं, उन [अङ्गिरसाम्] अङ्गारों के (तपसा) ताप से (तप्यध्वम्) उक्त पदार्थों को तपाओ
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (जनयत्यै) सर्व सुख उत्पन्न करनेवाली राज्यलक्ष्मी के लिये (त्वा) उस यज्ञ को (संयौमि) अग्नि के बीच में पदार्थों को छोड़कर युक्त करता हूँ, वैसे ही तुम लोगों को भी अग्नि के संयोग से सिद्ध करना चाहिये। जो हम लोगों का (इदम्) यह संस्कार किया हुआ हवि (अग्नेः) अग्नि के बीच में छोड़ा जाता है, (इदम्) वह विस्तार को प्राप्त होकर (अग्नीषोमयोः) अग्नि और सोम के बीच पहुँच कर (इषे) अन्न आदि पदार्थों के उत्पन्न करने के लिये होता है और जो (विश्वायुः) पूर्ण आयु और (उरुप्रथाः) बहुत सुख का देनेवाला (घर्मः) यज्ञ (असि) है, उसका जैसे मैं अनेक प्रकार विस्तार करता हूँ, वैसे (त्वा) उसको हे पुरुषो ! तुम भी (उरु प्रथस्व) विस्तृत करो। इस प्रकार विस्तार करनेवाले (ते) तुम्हारे लिये (यज्ञपतिः) यज्ञ का स्वामी (अग्निः) यज्ञ सम्बन्धी अग्नि (सविता) अन्तर्यामी (देवः) जगदीश्वर (उरु प्रथताम्) अनेक प्रकार सुख को बढ़ावे [(ते त्वचं) तुम्हारे शरीर को] (मा हिंसीत्) कभी नष्ट न करे तथा वह परमेश्वर (वर्षिष्ठे) अतिशय करके वृद्धि को प्राप्त हुआ (अधिनाके) जो अत्युत्तम सुख है, उसमें (त्वा) तुम को (श्रपयतु) सुख से युक्त करे ॥ यह इस मन्त्र का प्रथम अर्थ हुआ ॥ अब दूसरा कहते हैं। हे मनुष्यो ! जैसे मैं जो (विश्वायुः) पूर्ण आयु तथा (उरुप्रथाः) बहुत सुख का देनेवाला (घर्मः) यज्ञ (असि) है, (त्वा) उस यज्ञ को (जनयत्यै) राज्यलक्ष्मी तथा (इषे) अन्न आदि पदार्थों के उत्पन्न करने के लिये (संयौमि) संयुक्त करता हूँ तथा उसकी सिद्धि के लिये (इदम्) यह (अग्नेः) अग्नि के बीच में और (इदम्) यह (अग्नीषोमयोः) अग्नि और सोम के बीच में संस्कार किया हुआ हवि [संवपामि] छोड़ता हूँ, वैसे तुम भी उस यज्ञ को (उरु प्रथस्व) विस्तार को प्राप्त करो, जिस कारण यह (अग्निः) भौतिक अग्नि (ते) तुम्हारे (त्वचम्) शरीर को (मा हिंसीत्) रोगों से नष्ट न करे और जैसे (देवः) जगदीश्वर (सविता) अन्तर्यामी (वर्षिष्ठे) अतिशय करके वृद्धि को प्राप्त हुआ, जो (अधिनाके) अत्युत्तम सुख है, उस में (त्वा) उस यज्ञ को अग्नि के बीच में परिपक्व करता है, वैसे तुम भी उस यज्ञ को (श्रपयतु) परिपक्व करो और (ते) तुम्हारे (यज्ञपतिः) यज्ञ का स्वामी भी उस यज्ञ को (उरु प्रथताम्) विस्तारयुक्त करे
हे (देव) सर्वानन्द के देनेवाले जगदीश्वर ! (सवितः) सब प्राणियों में अन्तर्यामी, सत्य प्रकाश करनेहारे आप की कृपा से हम लोग परस्पर उपदेश करें कि जैसे यह सब का प्रकाश करनेवाला सूर्य्यलोक इस पृथिवी में अनेक बन्धन के हेतु किरणों से खींचकर पृथिवी आदि सब पदार्थों को बाँधता है, वैसे तुम भी दुष्टों को बाँधकर अच्छे-अच्छे गुणों का प्रकाश करो और जैसे मैं (पृथिव्यै) पृथिवी में (देवयजनात्) विद्वान् लोग जिस संग्राम से अच्छे-अच्छे पदार्थ वा उत्तम-उत्तम विद्वानों की सङ्गति को प्राप्त होते हैं, उस से (अररुम्) दुष्ट स्वभाववाले शत्रुजन को (अपवध्यासम्) मारता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी उसको मारो तथा जैसे मैं (व्रजम्) उत्तम-उत्तम गुण जतानेवाले सज्जनों के सङ्ग को प्राप्त होता हूँ, वैसे तुम भी उसको (गच्छ) प्राप्त हो। जैसे मैं (गोष्ठानम्) पठन-पाठन व्यवहार को बतानेवाली मेघ की गर्जना के समतुल्य वेदवाणी को अच्छे-अच्छे शब्दरूपी बूँदों से हर्षाता हूँ, वैसे तुम भी (वर्षतु) वर्षाओ। जैसे मेरी विद्या की (द्यौः) शोभा सब को दृष्टिगोचर है, वैसे (ते) तुम्हारी भी विद्या सुशोभित हो। जैसे मैं (यः) जो मूर्ख (अस्मान्) विद्या का प्रचार करनेवाले हम लोगों से (द्वेष्टि) विरोध करता है (च) और (यम्) जिस विद्याविरोधीजन को (वयम्) हम विद्वान् लोग (द्विष्मः) दुष्ट समझते हैं, (तम्) उस (परम्) विद्या के शत्रु को (अस्याम्) इस सब पदार्थों की धारण करने और विविध सुख देनेवाली (पृथिव्याम्) पृथिवी में (शतेन) बहुत से (पाशैः) बन्धनों से नित्य बाँधता हूँ, कभी उससे उसको नहीं त्यागता, वैसे हे वीर लोगो ! तुम भी उसको (बधान) बाँधो, कभी उसको (अतः) उस बन्धन से (मा मौक्) मत छोड़ो और जो दुष्ट जन हम लोगों से विरोध करें तथा जिस दुष्ट से हम लोग विरोध करें, उसको उस बन्धन से कोई मनुष्य न छोड़े। इस प्रकार सब लोग उसको उपदेश करते रहें कि हे (अररो) दुष्टपुरुष ! तू (दिवम्) प्रकाश उन्नति को (मा पप्तः) मत प्राप्त हो तथा (ते) तेरा (द्रप्सः) आनन्द देनेवाला विद्यारूपी रस (द्याम्) आनन्द को (मा स्कन्) मत प्राप्त करे। हे श्रेष्ठों के मार्ग चाहनेवाले मनुष्यो ! जैसे मैं (व्रजम्) विद्वानों के प्राप्त होने योग्य श्रेष्ठ मार्ग को प्राप्त होता हूँ, वैसे तुम भी (गच्छ) उसको प्राप्त हो। जैसे यह (द्यौः) सूर्य का प्रकाश (गोष्ठानम्) पृथिवी का स्थान अन्तरिक्ष को सींचता है, वैसे ही ईश्वर वा विद्वान् पुरुष (ते) तुम्हारी कामनाओं को (वर्षतु) वर्षावें अर्थात् क्रम से पूरी करें। जैसे यह (देव) व्यवहार का हेतु (सवितः) सूर्य्यलोक (अस्याम्) इस बीज बोने योग्य (पृथिव्याम्) बहुत प्रजायुक्त पृथिवी में (शतेन) अनेक (पाशैः) बन्धन के हेतु किरणों से आकर्षण के साथ पृथिवी आदि सब पदार्थों को बाँधता है, वैसे तुम भी दुष्टों को बाँधो और (यः) जो न्यायविरोधी (अस्मान्) न्यायाधीश हम लोगों से (द्वेष्टि) कोप करता है (च) और (यम्) अन्यायकारी जन पर (वयम्) सम्पूर्ण हितसम्पादन करनेवाले हम लोग (द्विष्मः) कोप करते हैं, (तम्) उस (परम्) शत्रु को (अस्याम्) इस (पृथिव्याम्) उक्त गुणवाली पृथिवी में (शतेन) अनेक (पाशैः) साम, दाम, दण्ड और भेद आदि उद्योगों से बाँधता हूँ और जैसे मैं उसको उस दण्ड से बाँधकर कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही तुम भी (बधान) बाँधो अर्थात् बन्धनरूप दण्ड सदा दो। (अतः) उसको कभी (मा मौक्) मत छोड़ो
मैं जिस [अनिशितः] अतिविस्तृत [सपत्नक्षित्] शत्रुओं के नाश करनेवाले संग्राम से (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और जिससे (प्रत्युष्टा अरातयः) सत्यविरोधी अच्छी प्रकार दाहरूप दण्ड को प्राप्त (असि) होते हैं, वा जिस बन्धन से (निष्टप्तं रक्षः) बाँधने योग्य (निष्टप्ता अरातयः) विद्या के विघ्न करनेवाले निरन्तर संताप को प्राप्त होते हैं, (त्वा) उस (वाजिनम्) वेग आदि गुणवाले संग्राम को (वाजेध्यायै) जो कि अन्न आदि पदार्थों से बलवान् करने के योग्य सेना है, उसके लिये युद्ध के साधनों को (संमार्ज्मि) अच्छी प्रकार शुद्ध करता हूँ, अर्थात् उनके दोषों का विनाश करता हूँ और मैं जिस (सपत्नक्षित्) शत्रु का नाश करनेवाले और (अनिशिता) अति विस्तारयुक्त सेना से (प्रत्युष्टं रक्षः) परसुख का न सहनेवाला मनुष्य वा (प्रत्युष्टा अरातयः) उक्त अवगुणवाले अनेक मनुष्य (निष्टप्तं रक्षः) जुआ खेलने और परस्त्रीगमन करने तथा (निष्टप्ता अरातयः) औरों को सब प्रकार से दुःख देनेवाले मनुष्य अच्छी प्रकार निकाले जाते हैं, (त्वा) उस (वाजिनीम्) बल और वेग आदि गुणवाली सेना को (वाजेध्यायै) बहुत साधनों से प्रकाशित करने के लिये (संमार्ज्मि) अच्छी प्रकार उत्तम-उत्तम शिक्षाओं से शुद्ध करता हूँ। [यह प्रथम अर्थ हुआ] ॥ और जो कि (अनिशितः) बड़ी क्रियाओं से सिद्ध होने योग्य वा (सपत्नक्षित्) दोषों वा शत्रुओं के विनाश करनेहारे (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और (प्रत्युष्टा अरातयः) जिसमें सत्यविरोधी अच्छी प्रकार दाहरूप दण्ड को प्राप्त (असि) होते हैं, वा (निष्टप्तं रक्षः) जिस बन्धन से बाँधने योग्य (निष्टप्ता अरातयः) विद्या के विघ्न करनेवाले निरन्तर सन्ताप को प्राप्त होते हैं (त्वा) उस (वाजिनम्) यज्ञ को (वाजेध्यायै) अन्न आदि पदार्थों के प्रकाशित होने के लिये (संमार्ज्मि) शुद्धता से सिद्ध करता हूँ। इस प्रकार जिस (सपत्नक्षित्) शत्रुओं का नाश करनेवाली (अनिशिता) अतिविस्तारयुक्त क्रिया से (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और (प्रत्युष्टा अरातयः) दुर्गुण तथा नीच मनुष्य नष्ट होते हैं, (निष्टप्तं रक्षः) काम, क्रोध आदि राक्षसी भाव दूर होते हैं, (निष्टप्ता अरातयः) जिसमें दुःख तथा दुर्गन्ध आदि दोष नष्ट [(असि)] होते हैं, (त्वा) उस (वाजिनीम्) सत्क्रिया को (वाजेध्यायै) अन्न आदि पदार्थों के प्रकाशित होने के लिये (सम्मार्ज्मि) भली प्रकार सिद्ध करता हूँ। इसी प्रकार आप भी इस यज्ञ तथा सत्क्रिया को पवित्रतापूर्वक सिद्ध करो, यह दूसरा अर्थ हुआ
हे जगदीश्वर ! जो आप (अदित्यै) पृथिवी के (रास्ना) रस आदि पदार्थों के उत्पन्न करनेवाले (असि) हैं, (विष्णोः) व्यापक (वेष्पः) पृथिवी आदि सब पदार्थों में प्रवर्त्तमान भी (असि) हैं तथा (अग्नेः) भौतिक अग्नि के (जिह्वा) जीभरूप (असि) हैं वा (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (धाम्ने धाम्ने) जिनमें कि वे विद्वान् सुखरूप पदार्थों को प्राप्त होते हैं, जो तीनों धाम अर्थात् स्थान, नाम और जन्म हैं, उन धामों की प्राप्ति के तथा (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र का आशय प्रकाशित होने के लिये (सुहूः) जो श्रेष्ठता से स्तुति करने के योग्य है, इस प्रकार के (त्वा) आप को मैं (अदब्धेन) प्रेमसुखयुक्त (चक्षुषा) विज्ञान से (ऊर्ज्जे) पराक्रम (अदित्यै) पृथिवी तथा (देवेभ्यः) श्रेष्ठ गुणों वा (धाम्ने धाम्ने) स्थान, नाम और जन्म आदि पदार्थों की प्राप्ति तथा (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र के आशय जानने के लिये [(त्वा) आपको] (अवपश्यामि) ज्ञानरूपी नेत्रों से देखता हूँ, आप भी कृपा करके [मे] मुझको विदित और मेरे पूजन को प्राप्त (भव) हूजिये ॥ यह इस मन्त्र का प्रथम अर्थ हुआ ॥ अब दूसरा कहते हैं ॥ जिस कारण यह यज्ञ (अदित्यै) अन्तरिक्ष के सम्बन्धी (रास्ना) रसादि पदार्थों की क्रिया का कारण (असि) है, (विष्णोः) यज्ञसम्बन्धी कार्य्यों का (वेष्पः) व्यापक (असि) है, (अग्नेः) भौतिक अग्नि का (जिह्वा) जिह्वारूप (असि) है, (देवेभ्यः) तथा दिव्य गुण (धाम्ने धाम्ने) कीर्ति, स्थान और जन्म इनकी प्राप्ति वा [मे] मेरे लिये (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र का आशय जानने के लिये (सुहूः) अच्छी प्रकार प्रशंसा करने योग्य (भव) होता है, इस कारण (त्वा) उस यज्ञ को मैं (अदब्धेन) सुखपूर्वक (चक्षुषा) प्रत्यक्ष प्रमाण के साथ नेत्रों से (अवपश्यामि) देखता हूँ तथा (त्वा) उसे (अदित्यै) पृथिवी आदि पदार्थ (देवेभ्यः) उत्तम-उत्तम गुण [(ऊर्जे) पराक्रम] (धाम्ने धाम्ने) स्थान-स्थान तथा (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र से हित होने के लिये (अवपश्यामि) क्रिया की कुशलता से देखता हूँ