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यजुर्वेद • अध्याय 1 • श्लोक 31
स॒वि॒तुस्त्वा॑ प्रस॒वऽउत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रेण॒ सूर्य्य॑स्य र॒श्मिभिः॑। स॒वि॒तुर्वः॑ प्र॒स॒वऽउत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य्य॑स्य र॒श्मिभिः॑। तेजो॑ऽसि शु॒क्रम॑स्य॒मृत॑मसि॒ धाम॒ नामा॑सि प्रि॒यं दे॒वाना॒मना॑धृष्टं देव॒यज॑नमसि ॥
जो यज्ञ (सवितुः) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये संसार में (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पवित्रेण) पवित्र तथा (सूर्य्यस्य) प्रकाशमय सूर्य्य की (रश्मिभिः) किरणों के साथ मिल के सब पदार्थों को शुद्ध करता है (त्वा) उस यज्ञ वा यज्ञकर्त्ता को मैं (उत्पुनामि) उत्कृष्टता के साथ पवित्र करता हूँ। इसी प्रकार (सवितुः) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए संसार में (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पवित्रेण) शुद्धिकारक (सूर्य्यस्य) जो कि ऐश्वर्य हेतुओं के प्रेरक प्राण के (रश्मिभिः) अन्तराशय के प्रकाश करनेवाले गुण हैं, उनसे (वः) तुम लोगों को तथा प्रत्यक्ष पदार्थों को यज्ञ करके (उत्पुनामि) पवित्र करता हूँ। हे ब्रह्मन् ! जिस कारण आप (तेजोऽसि) स्वयंप्रकाशवान् (शुक्रमसि) शुक्र (अमृतमसि) नाशरहित (धामासि) सब पदार्थों का आधार (नामासि) वन्दना करने योग्य (देवानाम्) विद्वानों के (प्रियम्) प्रीतिकारक (अनाधृष्टम्) तथा किसी की भयता में न आने योग्य वा (देवयजनमसि) विद्वानों के पूजा करने योग्य हैं, इससे मैं (त्वा) आपका ही आश्रय करता हूँ ॥ यह इस मन्त्र का प्रथम अर्थ हुआ ॥ जिस कारण यह यज्ञ (तेजोऽसि) प्रकाश और (शुक्रमसि) शुद्धि का हेतु (अमृतमसि) मोक्ष सुख का देने तथा (धामासि) सब अन्न आदि पदार्थों की पुष्टि करने वा (नामासि) जल का हेतु (देवानाम्) श्रेष्ठ गुणों की (प्रियम्) प्रीति कराने तथा (अनाधृष्टम्) किसी को खण्डन करने के योग्य नहीं अर्थात् अत्यन्त उत्कृष्ट और (देवयजनम्) विद्वान् जनों को परमेश्वर का पूजन करानेवाला (असि) है, इस कारण इस यज्ञ से मैं (सवितुः) जगदीश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए संसार में (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पवित्रेण) अति शुद्ध यज्ञ वा (सूर्य्यस्य) ऐश्वर्य्य उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर के गुण अथवा ऐश्वर्य्य के उत्पन्न करानेवाले सूर्य्य की (रश्मिभिः) विज्ञानादि प्रकाश वा किरणों से (वः) तुम लोग वा प्रत्यक्ष पदार्थों को (उत्पुनामि) पवित्र करता हूँ ॥ यह दूसरा अर्थ हुआ
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