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यजुर्वेद • अध्याय 1 • श्लोक 26
अपा॒ररुं॑ पृथि॒व्यै दे॑व॒यज॑नाद्वध्यासं व्र॒जं ग॑च्छ गो॒ष्ठानं॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्या श॒तेन॒ पाशै॒र्यो᳕ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्विष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क्। अर॑रो॒ दिवं॒ मा प॑प्तो द्र॒प्सस्ते॒ द्यां मा स्क॑न् व्र॒जं ग॑च्छ गो॒ष्ठानं॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्या श॒तेन॒ पाशै॒र्यो᳕ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क् ॥
हे (देव) सर्वानन्द के देनेवाले जगदीश्वर ! (सवितः) सब प्राणियों में अन्तर्यामी, सत्य प्रकाश करनेहारे आप की कृपा से हम लोग परस्पर उपदेश करें कि जैसे यह सब का प्रकाश करनेवाला सूर्य्यलोक इस पृथिवी में अनेक बन्धन के हेतु किरणों से खींचकर पृथिवी आदि सब पदार्थों को बाँधता है, वैसे तुम भी दुष्टों को बाँधकर अच्छे-अच्छे गुणों का प्रकाश करो और जैसे मैं (पृथिव्यै) पृथिवी में (देवयजनात्) विद्वान् लोग जिस संग्राम से अच्छे-अच्छे पदार्थ वा उत्तम-उत्तम विद्वानों की सङ्गति को प्राप्त होते हैं, उस से (अररुम्) दुष्ट स्वभाववाले शत्रुजन को (अपवध्यासम्) मारता हूँ, वैसे ही तुम लोग भी उसको मारो तथा जैसे मैं (व्रजम्) उत्तम-उत्तम गुण जतानेवाले सज्जनों के सङ्ग को प्राप्त होता हूँ, वैसे तुम भी उसको (गच्छ) प्राप्त हो। जैसे मैं (गोष्ठानम्) पठन-पाठन व्यवहार को बतानेवाली मेघ की गर्जना के समतुल्य वेदवाणी को अच्छे-अच्छे शब्दरूपी बूँदों से हर्षाता हूँ, वैसे तुम भी (वर्षतु) वर्षाओ। जैसे मेरी विद्या की (द्यौः) शोभा सब को दृष्टिगोचर है, वैसे (ते) तुम्हारी भी विद्या सुशोभित हो। जैसे मैं (यः) जो मूर्ख (अस्मान्) विद्या का प्रचार करनेवाले हम लोगों से (द्वेष्टि) विरोध करता है (च) और (यम्) जिस विद्याविरोधीजन को (वयम्) हम विद्वान् लोग (द्विष्मः) दुष्ट समझते हैं, (तम्) उस (परम्) विद्या के शत्रु को (अस्याम्) इस सब पदार्थों की धारण करने और विविध सुख देनेवाली (पृथिव्याम्) पृथिवी में (शतेन) बहुत से (पाशैः) बन्धनों से नित्य बाँधता हूँ, कभी उससे उसको नहीं त्यागता, वैसे हे वीर लोगो ! तुम भी उसको (बधान) बाँधो, कभी उसको (अतः) उस बन्धन से (मा मौक्) मत छोड़ो और जो दुष्ट जन हम लोगों से विरोध करें तथा जिस दुष्ट से हम लोग विरोध करें, उसको उस बन्धन से कोई मनुष्य न छोड़े। इस प्रकार सब लोग उसको उपदेश करते रहें कि हे (अररो) दुष्टपुरुष ! तू (दिवम्) प्रकाश उन्नति को (मा पप्तः) मत प्राप्त हो तथा (ते) तेरा (द्रप्सः) आनन्द देनेवाला विद्यारूपी रस (द्याम्) आनन्द को (मा स्कन्) मत प्राप्त करे। हे श्रेष्ठों के मार्ग चाहनेवाले मनुष्यो ! जैसे मैं (व्रजम्) विद्वानों के प्राप्त होने योग्य श्रेष्ठ मार्ग को प्राप्त होता हूँ, वैसे तुम भी (गच्छ) उसको प्राप्त हो। जैसे यह (द्यौः) सूर्य का प्रकाश (गोष्ठानम्) पृथिवी का स्थान अन्तरिक्ष को सींचता है, वैसे ही ईश्वर वा विद्वान् पुरुष (ते) तुम्हारी कामनाओं को (वर्षतु) वर्षावें अर्थात् क्रम से पूरी करें। जैसे यह (देव) व्यवहार का हेतु (सवितः) सूर्य्यलोक (अस्याम्) इस बीज बोने योग्य (पृथिव्याम्) बहुत प्रजायुक्त पृथिवी में (शतेन) अनेक (पाशैः) बन्धन के हेतु किरणों से आकर्षण के साथ पृथिवी आदि सब पदार्थों को बाँधता है, वैसे तुम भी दुष्टों को बाँधो और (यः) जो न्यायविरोधी (अस्मान्) न्यायाधीश हम लोगों से (द्वेष्टि) कोप करता है (च) और (यम्) अन्यायकारी जन पर (वयम्) सम्पूर्ण हितसम्पादन करनेवाले हम लोग (द्विष्मः) कोप करते हैं, (तम्) उस (परम्) शत्रु को (अस्याम्) इस (पृथिव्याम्) उक्त गुणवाली पृथिवी में (शतेन) अनेक (पाशैः) साम, दाम, दण्ड और भेद आदि उद्योगों से बाँधता हूँ और जैसे मैं उसको उस दण्ड से बाँधकर कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही तुम भी (बधान) बाँधो अर्थात् बन्धनरूप दण्ड सदा दो। (अतः) उसको कभी (मा मौक्) मत छोड़ो
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