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अध्याय 1 — प्रथमः खण्डः

सुबाल
6 श्लोक • केवल अनुवाद
ऋषियों की सभा में ऋषि प्रमुख रैक्व ऋषि के द्वारा सृष्टि के सन्दर्भ में प्रश्न किये जाने पर कि सृष्टि के पूर्व क्या था? घोराङ्गिरस ने कहा - सृष्टि के पूर्व न सत् था, न असत् और न सदसत् था।
(इसके बाद क्या-क्या उत्पन्न हुआ? इस प्रश्न के उत्तर में ऋषि ने कहा -) सर्वप्रथम आदितत्त्व से) तम की उत्पत्ति हुई, तम से भूत आदि (अक्षर, अव्यक्त, अहंकार आदि) का आविर्भाव हुआ। भूतादि से आकाश, आकाशः से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई।
यही (सब मिलकर) ब्रह्माण्ड रूप अण्ड हो गया। इसमें एक संवत्सर (अवधि विशेष) तक स्थित होकर पुरुष ने इसे दो भागों में विभक्त कर दिया। नीचे का भाग पृथिवी और ऊपर का भाग आकाश हुआ, इन दोनों के मध्य में सहस्त्र शिर वाला, सहस्र नेत्रों वाला, सहस्र पैरों और सहस्र बाँहों वाला दिव्य पुरुष (विराट् पुरुष) प्रकट हुआ।
उसने सर्वप्रथम प्राणियों की मृत्यु को सृजा। जिसका स्वरूप तीन नेत्रों वाले रुद्र, तीन मस्तक बाले और तीन पैरों वाले खण्डपरशु का था।
अपने द्वारा रचे हुए इस रूप को देखकर वह (ब्रह्मा) भयभीत हुए, तब वे (रुद्र) ब्रह्मा में ही प्रविष्ट हो गये। तदनन्तर उन्होंने (ब्रह्मा ने) सात मानस पुत्र उत्पन्न किये, उन सात पुत्रों ने (पुनः) सात विराट् मानसपुत्रों को जन्म दिया, वे (सात पुत्र) ही प्रजापति हुए।
इस विराट् पुरुष के मुख से ब्राह्मण, दोनों बाँहों से क्षत्रिय, दोनों जंघाओं से वैश्य तथा दोनों पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। मन से चन्द्रमा, चक्षु से सूर्य, श्रोत्र से वायु तथा प्राण और हृदय से यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ।
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