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अध्याय 2 — द्वितीय खण्ड

मुद्गल
7 श्लोक • केवल अनुवाद
अब इसी प्रकार मुद्गलोपनिषद् में पुरुषसूक्त के वैभव का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है। भगवान् वासुदेव ने इन्द्र को भगवत्-ज्ञान का उपदेश देकर, पुनः सूक्ष्म तत्त्वों को ग्रहण करने की इच्छा से विनीत होकर प्रणाम करने वाले इन्द्र को परम रहस्यमय पुरुषसूक्त का उपदेश उसके दो खण्डों के माध्यम से प्रदान किया।
अब पुरुषसूक्त के दो खण्डों का वर्णन किया जाता है। जो यह पुरुष है, उसने नाम, रूप और ज्ञान से अगोचर, तथा संसारियों के लिए अत्यन्त दुर्ज्ञेय अपने वास्तविक स्वरूप को गुप्त रखकर, क्लेश आदि से पीड़ित देवताओं तथा अन्य प्राणियों का उद्धार करने की इच्छा से, सहस्रों कलाओं और दिव्य अवयवों से युक्त, कल्याणमय ऐसा रूप धारण किया, जिसका केवल दर्शन मात्र ही मोक्ष प्रदान करने वाला है। उस दिव्य रूप को धारण करके उन्होंने पृथ्वी आदि समस्त लोकों को व्याप्त कर लिया और उनसे भी परे अनन्त योजन तक स्थित रहे।
यह पुरुष ही नारायण हैं, जो भूत (अतीत), भव्य (वर्तमान) और भविष्य (भविष्यकाल) — तीनों रूपों में विद्यमान थे। वे ही समस्त प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। और वे समस्त महिमाओं से भी महान् हैं। अतः उनसे श्रेष्ठ अथवा उनके समान कोई भी नहीं है।
महापुरुष ने अपने स्वरूप को चार भागों में विभाजित किया। उनमें से तीन पादों द्वारा वे परम व्योम (परम धाम) में स्थित रहे, और चतुर्थ भाग के रूप में अनिरुद्ध नारायण होकर उन्होंने समस्त विश्वों में व्याप्त होकर निवास किया। (उस विराट् पुरुष के तीन चरण उच्च लोकों में ही निरुद्ध (नियंत्रित-रोके हुए) रहते हैं। एक चरण अनिरुद्ध (जिसे व्यक्त होने से रोका नहीं गया) होता है। उसी व्यक्त चरण से यह सृष्टि उपजी है। शेष तीन नाम मन्त्र में व्यक्त नहीं हैं, फिर भी अनिरुद्ध के आधार पर भगवान् के इन नामों को विद्वानों ने मान्य किया है। ये चरण वासुदेव सबको वास देने वाले, प्रद्युम्न- विशेष रूप से प्रकाशमान तथा संकर्षण-आकर्षण करने वाले हैं, फिर भी अव्यक्त हैं।)
और उस पादनारायण ने जगत् की सृष्टि के लिए प्रकृति को उत्पन्न किया। वह प्रकृति, यद्यपि अत्यन्त सामर्थ्ययुक्त थी, तथापि स्वयं सृष्टि-कार्य करने में समर्थ नहीं हुई। तब अनिरुद्ध नारायण ने उसे सृष्टि की विधि का उपदेश दिया। उन्होंने कहा— "हे ब्रह्मन्! अपने इन्द्रियों को याजक (यज्ञ करने वाले ऋत्विज्) के रूप में ध्यान करो। इस ग्रन्थिरूप दृढ़ शरीर को हवि (आहुति) के रूप में ध्यान करो। मुझे हवि का भोग करने वाले के रूप में ध्यान करो। वसन्त ऋतु को घृत, ग्रीष्म ऋतु को समिधा, और शरद् ऋतु को हवि का रस मानकर इस प्रकार यज्ञाग्नि में आहुति दो।" इस प्रकार यज्ञ करने पर, अंग-स्पर्श से यह शरीर वज्र के समान दृढ़ और शक्तिशाली हो जाएगा। तत्पश्चात्, अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त होने वाले समस्त प्राणियों और जीवों की सृष्टि होगी। फिर उनसे आगे अन्य प्राणियों का प्रादुर्भाव होगा, और इस प्रकार स्थावर (अचल) तथा जङ्गम (चल) रूप सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति होगी।
इस प्रकार, जीव और परमात्मा के योग (एकत्व-संबंध अथवा परमात्म-प्राप्ति) के द्वारा मोक्ष की प्रक्रिया का भी प्रतिपादन किया गया है— ऐसा यहाँ समझना चाहिए।
जो पुरुष इस सृष्टिरूप यज्ञ तथा मोक्ष की प्रक्रिया को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह पूर्ण आयु को प्राप्त करता है और परम पुरुषार्थ की सिद्धि प्राप्त करता है।
Krishjan
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