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मुद्गल • अध्याय 2 • श्लोक 3
पुरुषो नारायणो भूतं भव्यं भविष्यच्चासीत्। स एष सर्वेषां मोक्षदशचासीत्। स च। सर्वस्मान्महिम्नो ज्यायान्। तस्मान्न कोऽपि न्यायान्॥
यह पुरुष ही नारायण हैं, जो भूत (अतीत), भव्य (वर्तमान) और भविष्य (भविष्यकाल) — तीनों रूपों में विद्यमान थे। वे ही समस्त प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। और वे समस्त महिमाओं से भी महान् हैं। अतः उनसे श्रेष्ठ अथवा उनके समान कोई भी नहीं है।
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