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मुद्गल • अध्याय 2 • श्लोक 4
महापुरुष आत्मानं चतुर्धा कृत्वा त्रिपादेन परमे व्योम्नि चासीत्। इतरेण चतुर्थेनानिरुद्धनारायणेन विश्वान्यासन्॥
महापुरुष ने अपने स्वरूप को चार भागों में विभाजित किया। उनमें से तीन पादों द्वारा वे परम व्योम (परम धाम) में स्थित रहे, और चतुर्थ भाग के रूप में अनिरुद्ध नारायण होकर उन्होंने समस्त विश्वों में व्याप्त होकर निवास किया। (उस विराट् पुरुष के तीन चरण उच्च लोकों में ही निरुद्ध (नियंत्रित-रोके हुए) रहते हैं। एक चरण अनिरुद्ध (जिसे व्यक्त होने से रोका नहीं गया) होता है। उसी व्यक्त चरण से यह सृष्टि उपजी है। शेष तीन नाम मन्त्र में व्यक्त नहीं हैं, फिर भी अनिरुद्ध के आधार पर भगवान् के इन नामों को विद्वानों ने मान्य किया है। ये चरण वासुदेव सबको वास देने वाले, प्रद्युम्न- विशेष रूप से प्रकाशमान तथा संकर्षण-आकर्षण करने वाले हैं, फिर भी अव्यक्त हैं।)
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