Krishjan
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अध्याय 73 — अथ छत्रलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
6 श्लोक • केवल अनुवाद
हंस, मुर्गा, मयूर, सारस-इनके पंखों से निर्मित नवीन, विशिष्ट, चेत वत्र से आच्छादित, लटकती हुई मोतियों की मालाओं से युक्त और स्फटिक
युक्त मूल (मूठ) वाला छत्र बनाकर उसमें छः हाथ लम्बा सोने से मढ़ा हुआ, नौ या सात पर्वो से युत एक काप्त का दण्ड लगाना चाहिये।
दण्डार्थ (तीन हाथ) तुल्य छत्र का व्यास रखना चाहिये एवं उसे चारो तरफ से आवृत्त और रत्नों से भूषित करना चाहिये। इस तरह राजा का श्रेष्ठ छत्र कल्याण और विजय को देने वाला होता है।
युवराज, रानी, सेनापति और दण्डनायक के छत्र का दण्ड साढ़े चार हाथ लम्बा और ढ़ाई हाथ व्यास वाला होता है।
युवराज को छोड़कर शेष राजपुत्रों के लिये मयूरपक्षों का बना हुआ, प्रसादपट्टों से शोभित शिर वाला और लटकती हुई रत्नमालाओं से युक्त छत्र धूपनिवृत्ति के लिये बनाना चाहिये।
अन्य पुरुषों के लिये शीत और धूप की निवृत्ति करने वाला चतुर्भुजाकार छत्र तथा ब्राह्मण के लिये गोल दण्डयुक्त छत्र बनाना चाहिये।
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