दण्डार्धविस्तृतं तत् समावृतं रत्नभूषितमुदप्रम् । नृपतेस्तदातपत्रं कल्याणपरं विजयदं च ॥
दण्डार्थ (तीन हाथ) तुल्य छत्र का व्यास रखना चाहिये एवं उसे चारो तरफ से आवृत्त और रत्नों से भूषित करना चाहिये। इस तरह राजा का श्रेष्ठ छत्र कल्याण और विजय को देने वाला होता है।
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