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अध्याय 38 — अथ रजोलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
8 श्लोक • केवल अनुवाद
जब घने अन्धकार की तरह धूलि से पर्वत, पुर, वृक्ष और सब दिशायें व्याप्त हो जाने से कुछ भी नहीं दिखाई देता हो, तो उस समय राजा का नाश कहना चाहिये ।
पहले जिस दिशा में धूलि को उत्पत्ति हो और जिस दिशा में नाश हो, उन दोनों दिशाओं में सात दिन के अन्दर निःसन्देह भय होता है।
सघन धूलि का समूह यदि चेत वर्ण का हो तो मन्त्री तथा ३ को पीड़ा, शोघ्र राख का प्रकोप और अत्यन्त कठिनता से कार्य की सिद्धि होती है।
यदि सूर्यास्त के समय उत्पन होकर धूलि एक या दो दिन तक आकाश को ढकी हुई रहे तो वह आने वाले उम्र भय को अभिव्यक्त करती है।
यदि बराबर इकट्ठी होकर धूलि एक रात्रि तक स्थित रहे तो प्रधान राजा की मृत्यु और शेष बुद्धिमान् राजाओं को शुभ करती है।
जिस देश में दो रात्रि तक बराबर घनीभूत पूलि फैलती है, उस देश में निश्चय ही किसी दूसरे राजा का आगमन कहना चाहिये ।
यदि तीन या चार रात्रि तक बराबर पूलि गिरती रहे तो अत्र और रस के विनाश के लिये होती है। यदि पाँच रात्रि तक लगातार धूलि का वर्षण हो तो राजाओं की सेनाओं में खलबली मचती है।
यदि केतु आदि के उदय के बाद धूलि गिरे तो तीव्र भय देने वाली होती है। आचार्यों का मत है कि शिशिर ऋतु के अतिरिक्त अन्य समस्त ऋतुओं में ठीक-ठीक फल देती
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