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अध्याय 35 — अथेन्द्रायुधलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
8 श्लोक • केवल अनुवाद
मेधयुत आकाश में वायु से सूर्यकिरण टकरा कर अनेक वर्णयुत धनुषाकार जो दिखाई देता है, लोग उसी को इन्द्रधनुष करते हैं।
किसी-किसी (काश्यप आदि) आचार्य का मत है कि नागराज के कुल में उत्पत्र सर्पों के निःश्रास से यह (इन्द्रधनुष) उत्पन होता है। यदि इसको सम्मुख करके राजा लोग गमन करें तो उनकी पराजय होती है।
अखण्ड, पृथ्वी में लगा हुआ, उज्ज्वल, निर्मल, अविकल, अनेक वर्णयुत, दो बार उदित या पश्चिम में स्थित इन्द्रधनुष दिखाई दे तो शुभ फल और बहुत वृष्टि करने वाला होता है। विशेष-यहाँ पर कोई-कोई अनुलोम का अर्थ दक्षिण दिशा में और दूसरा उत्तर दिशा में ऐसा कहते है।
विदिशा ( ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य) में यदि इन्द्रधनुष दिखाई दे तो उस दिशा के स्वामी ( ८६ वें अध्याय के ३४ वें पद्म में उक्त) का नाश होता है। थोड़ा लाल, पीला और नीला इन्द्रधनुष हो तो क्रम से शखदोष, अग्निदोष और दुर्भिक्ष करता है।
यदि जल में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो अनावृष्टि, पृथ्वी पर दिखाई दे तो धान्यों का नाश, वृक्ष पर दिखाई दे तो व्याधि, चल्मीक (वमई दीबड़ा की भीड़ पर दिखाई दे तो शखभय और रात्रि में दिखाई दे तो मन्त्री का मरण होता है।
यदि अनावृष्टि के समय पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो वृष्टि और वृष्टि के समय दिखाई दे तो अनावृष्टि करता है तथा पश्चिम दिशा में स्थित इन्द्रधनुष सदा वृष्टि को करता है।
यदि रात्रि के समय पूर्व दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो राजा को पोड़ित करता है तथा दक्षिण दिशा में दिखाई दे तो सेनापति, पश्चिम में प्रधान पुरुष और उत्तर में इन्द्रधनुष दिखाई दे तो मन्त्री का नाश करता है।
यदि रात्रि के समय घेत आदि (चेत, रक्त, पौत और कृष्ण) वर्ण का इन्द्रधनुष दिखाई दे तो ब्राह्मण आदि वर्णों का नाश करता है। जैसे खेत वर्ण का हो तो ब्राह्मणों का, रक्त वर्ण का हो तो क्षत्रियों का, पीत वर्ण का हो तो वैश्यों का और कृष्ण वर्ण का हो तो शूद्रों का नाश करता है तथा जिस दिशा में इन्द्रधनुष दिखाई देता है, उस दिशा के प्रधान राजा का शीघ्र नाश करता है।
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