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बृहत्संहिता • अध्याय 35 • श्लोक 2
केचिदनन्तकुलोरगनिःश्वासोद्भूतमाहुराचार्याः तद्यायिनां नृपाणामभिमुखमजयावही भवति ॥
किसी-किसी (काश्यप आदि) आचार्य का मत है कि नागराज के कुल में उत्पत्र सर्पों के निःश्रास से यह (इन्द्रधनुष) उत्पन होता है। यदि इसको सम्मुख करके राजा लोग गमन करें तो उनकी पराजय होती है।
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