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अध्याय 1 — भिक्षुकोपनिषद्
भिक्षुक
5 श्लोक • केवल अनुवाद
मोक्षार्थी भिक्षुओं
की चार श्रेणियाँ होती हैं—
कुटीचक
बहूदक
हंस
परमहंस
(यहाँ मोक्षार्थी भिक्षुओं के सम्बन्ध में अनुशासन का वर्णन किया जा रहा है। भोगार्थी अथवा स्वार्थी भिक्षु वे होते हैं, जो अपनी असमर्थता के कारण भिक्षा माँगते हैं; जबकि मोक्षार्थी भिक्षु समर्थ होते हुए भी लौकिक बन्धनों से ऊपर उठने के उद्देश्य से भिक्षाजीवी जीवन अपनाते हैं।)
कुटीचक भिक्षु
गौतम
,
भरद्वाज
,
याज्ञवल्क्य
और
वसिष्ठ
आदि के समान
अष्टग्रास
भोजन ग्रहण करके
योगमार्ग
(योग के माध्यम से)
द्वारा
मोक्ष
की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं।
(केवल शरीर-रक्षा के लिए न्यूनतम भोजन का एक मान
अष्टग्रास
माना गया है।
एक ग्रास
उतना अन्न है, जिसे एक बार में मुख में रखकर चबाया जा सके। ऐसे
आठ ग्रास
भोजन से शरीर की रक्षा संभव है—ऐसे अनुभव के आधार पर यह नियम बनाया गया प्रतीत होता है।)
बहूदक भिक्षु
त्रिदण्ड
,
कमण्डलु
,
शिखा
,
यज्ञोपवीत
तथा
काषाय वस्त्र
धारण करते हैं। वे
मधु
और
मांस
का त्याग करके
ब्रह्मर्षि
(किसी सदाचारी नैष्ठिक)
के घर में
भिक्षाचरण
द्वारा
आठ ग्रास
भोजन ग्रहण करते हुए
योगमार्ग
के माध्यम से
मोक्ष
का अनुसंधान करते हैं।
हंस नामक भिक्षु
किसी
गाँव
में
एक रात्रि
,
नगर
में
पाँच रात्रि
तथा
तीर्थक्षेत्र
में
सात रात्रि
से अधिक निवास नहीं करते। वे
गोमूत्र
और
गोमय
(गोबर)
का आहार ग्रहण करते हुए नित्य
चान्द्रायण व्रत
का पालन करते हैं तथा
योगमार्ग
द्वारा
मोक्ष
की खोज करते हैं।
(यहाँ
गोमूत्र
और
गोमय
को
पञ्चगव्य
आदि के रूप में
अन्तःकरण-शुद्धि
के उद्देश्य से ग्रहण करने का विधान प्रस्तुत किया गया है।)
परमहंस
नामक
भिक्षु
संवर्तक
,
आरुणि
,
श्वेतकेतु
,
जड़भरत
,
दत्तात्रेय
,
शुकदेव
,
वामदेव
और
हारीतक
आदि की भाँति
अष्टग्रास
भोजन ग्रहण करके
योगमार्ग
में विचरण करते हुए
मोक्ष
की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
परमहंसों
का निवास-स्थान
वृक्षमूल
,
शून्यगृह
अथवा
श्मशान
होता है। वे
वस्त्रयुक्त
(साम्बर)
अथवा
दिगम्बर
होते हैं। उनके लिए
धर्म-अधर्म
,
लाभ-अलाभ
का कोई भेद नहीं होता। वे
शुद्ध
और
अशुद्ध
के द्वैत के सम्बन्ध में कोई अभिमत नहीं रखते। वे
मिट्टी
,
पत्थर
और
सोने
में कोई भेद नहीं करते, अर्थात् उनके लिए ये सभी समान हैं। वे सभी
वर्णों
में
भिक्षाचरण
करते हैं तथा सर्वत्र अपनी
आत्मा
का ही दर्शन करते हैं। वे
जातरूपधर
(नवजात शिशु की भाँति निर्लिप्त, निर्विकार तथा शुचि-अशुचि के भाव से परे)
होते हैं। वे
(परमहंस)
निर्द्वन्द्व
,
परिग्रहरहित
,
शुक्लध्यान
में परायण,
आत्मनिष्ठ
तथा केवल
जीवन-निर्वाह
के लिए यथोचित समय पर
भिक्षाटन
करने वाले होते हैं। वे
एकान्त गृह
,
देवस्थल
,
झोपड़ी
,
वल्मीक
(बाँबी)
,
वृक्षमूल
,
कुलालशाला
(कुम्भकार का गृह)
,
यज्ञशाला
,
नदीतट
,
पर्वत-गुफा
,
टीला
,
गड्ढा
,
झरना
आदि किसी भी स्थान पर निवास करते हैं। वहाँ निवास करते हुए वे भली-भाँति
(आत्मिक विभूतियों से)
सम्पन्न होकर
शुद्ध मन
से
परमहंस-वृत्ति
का पालन करते हुए
संन्यास
में ही शरीर का त्याग करते हैं। ऐसे
(इस प्रकार आचरण करने वाले)
परमहंस
कहलाते हैं—ऐसा इस
उपनिषद्
का अभिमत है।
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