अथ हंसा नाम ग्राम एकरात्रं नगरे पञ्चरात्रं क्षेत्रे सप्तरात्रं तदुपरि न वसेयुः ।
गोमूत्रगोमयाहारिणो नित्यं चान्द्रायणपरायणा योगमार्गे मोक्षमेव प्रार्थयन्ते ॥
हंस नामक भिक्षु किसी गाँव में एक रात्रि, नगर में पाँच रात्रि तथा तीर्थक्षेत्र में सात रात्रि से अधिक निवास नहीं करते।
वे गोमूत्र और गोमय(गोबर) का आहार ग्रहण करते हुए नित्य चान्द्रायण व्रत का पालन करते हैं तथा योगमार्ग द्वारा मोक्ष की खोज करते हैं।
(यहाँ गोमूत्र और गोमय को पञ्चगव्य आदि के रूप में अन्तःकरण-शुद्धि के उद्देश्य से ग्रहण करने का विधान प्रस्तुत किया गया है।)
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