परमहंस नामक भिक्षुसंवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, जड़भरत, दत्तात्रेय, शुकदेव, वामदेव और हारीतक आदि की भाँति अष्टग्रास भोजन ग्रहण करके योगमार्ग में विचरण करते हुए मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
परमहंसों का निवास-स्थान वृक्षमूल, शून्यगृह अथवा श्मशान होता है।
वे वस्त्रयुक्त(साम्बर) अथवा दिगम्बर होते हैं।
उनके लिए धर्म-अधर्म, लाभ-अलाभ का कोई भेद नहीं होता।
वे शुद्ध और अशुद्ध के द्वैत के सम्बन्ध में कोई अभिमत नहीं रखते।
वे मिट्टी, पत्थर और सोने में कोई भेद नहीं करते, अर्थात् उनके लिए ये सभी समान हैं।
वे सभी वर्णों में भिक्षाचरण करते हैं तथा सर्वत्र अपनी आत्मा का ही दर्शन करते हैं।
वे जातरूपधर(नवजात शिशु की भाँति निर्लिप्त, निर्विकार तथा शुचि-अशुचि के भाव से परे) होते हैं।
वे (परमहंस)निर्द्वन्द्व, परिग्रहरहित, शुक्लध्यान में परायण, आत्मनिष्ठ तथा केवल जीवन-निर्वाह के लिए यथोचित समय पर भिक्षाटन करने वाले होते हैं। वे एकान्त गृह, देवस्थल, झोपड़ी, वल्मीक(बाँबी), वृक्षमूल, कुलालशाला(कुम्भकार का गृह), यज्ञशाला, नदीतट, पर्वत-गुफा, टीला, गड्ढा, झरना आदि किसी भी स्थान पर निवास करते हैं।
वहाँ निवास करते हुए वे भली-भाँति (आत्मिक विभूतियों से) सम्पन्न होकर शुद्ध मन से परमहंस-वृत्ति का पालन करते हुए संन्यास में ही शरीर का त्याग करते हैं।
ऐसे (इस प्रकार आचरण करने वाले)परमहंस कहलाते हैं—ऐसा इस उपनिषद् का अभिमत है।
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